फ़ैसले के बाद का इक सवाल

मुमकिना फ़ैसलों में इक हिज्र का फ़ैसला भी था
हमने तो एक बात की उसने कमाल कर दिया। ~परवीन शाकिर

घर की मरम्मत के काम से उड़ती हुई गर्द ने सब धुले कपड़ों को ढक लिया। कई रोज़ से एक ही जीन्स और दो टी में फिरता रहा। कल रात ये सोचा था कि कपड़े पानी से निकाल कर सुखा दूंगा कि बाद दिनों के बदल कर कुछ पहनूँ। दिनों से कड़ी धूप थी मगर आज कहीं से बादलों का टोला चला आया है। आठ बजे हैं और धूप गुम है।

अचानक कोई मिले और आप पीछे झांकने लगें। आपको वे लोग याद आये जो पास बैठे होने को नज़दीकी समझने लगे थे। अचानक वे भी याद आएं जिनसे नज़दीकी थी मगर कभी पास न बैठे थे। हवा में गिरहें पड़ने लगें, जब कोई अपने हादसे सुनाये और कहता जाये कि इन बातों का आपसे कोई वास्ता नहीं है। और सुनते हुए दिल सोचता जाये कि जब वास्ता नहीं है तो इस मुलाक़ात में उन्हीं की याद क्यों हैं?

कई बार एक ही रास्ते तनहा चलते हुए कोई अजनबी भला सा लगने लगता है। सफ़र के रास्ते के सूनेपन पर कोई साया। जहाँ से गुम हो सब छाँव, सब धूप ला पता हो। जहाँ सांस किसी याद की तरह आये। जहाँ एक सिरा दिख रहा हो। ठीक वहीँ जवाब से सवाल, चुप्पी से सवाल और सवाल से सवाल उगते जाएँ।

ख़यालों के इस वृन्द से ठिठक कर मन देखता है पुल की ढलान से उतरते हुए नौजवान। पीठ पर अपना थैला बांधे। ऊँची आवाज़ में बतियाते। उनपर एक धूप की लकीर आई और फिर से खो गयी। जैसे हम कहीं बहुत पीछे छूट गए थे और इस छूट जाने की याद एक लकीर की तरह बनी और मिट गयी।

सुबह छः बजे परवीन शाकिर साहबा की आवाज़ यूट्यूब पर थी। उनके शेर छूकर गुज़रते रहे मगर ज़िन्दगी की याद में ये शेर मन में अटक गया। कई बार फ़ैसला किया था कि ऐ ज़िन्दगी हम बिछड़ जाएं तो अच्छा मगर वो हर बार कोई न कोई सवाल करके चुप हो जाती रही।

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Published on September 28, 2016 20:01
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Kishore Chaudhary
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