इस आग ही आग में
तिवारी जी ने कार रोक दी है। हापुड़ से मयूर विहार तक शैलेश भारतवासी एक कहानी सुना रहे थे। मानव कौल की लिखी कहानी। मैंने ऐसे अनेक सफर किये हैं। मगर उन सब में कहानी मैं ही सुना रहा होता था। मैंने आज तक जितनी कहानियां सुनाई हैं , वे सब झूठ हैं। कहानी को सच क्यों होना चाहिए जबकि हम झूठ भर से ही किसी का जी दुखा सकते हैं। झूठ भर से काटा जा सकता है एक लंबा सफर। आज जो मैंने कहानी सुनी वह तीन लड़कों की प्रेम कहानी है. प्रेम एक युद्ध है. इस कहानी में शांति के मोर्चे पर बैठे एक दूजे को अपने भीतर सहेजे दोस्त अचानक युद्ध के आरम्भ हो जाने के हाल में घिर जाते हैं. इसके बाद मोर्चे पर हो रही हलचल कथानक में बढती जाती है. घटनाएं तेज़ गति से घटती है और योजनाएं नाकाम होती जाती है। प्रेम वस्तुतः नाकामी को अपने पहलू में रखता है और बार-बार इस बात का परिक्षण करता है कि क्या सबकुछ ऐसे ही होना था? वह सोचने लगता है कि गुणी और योग्य व्यक्ति की जगह प्रेम को अक्सर चापलूस और मौकापरस्त चुरा लेते हैं. प्रेम हवा का तेज़ झोंका है जो जीवन को आलोड़ित करके कहीं छुप जाता है. शुक्रिया मानव इतनी सुंदर कहानी कहने के लिए।
मैंने इस कहानी के कोई पंद्रह सत्रह पन्ने सुने. इसी कथावाचन और श्रवण में हम हापुड़ से दिल्ली के मयूर विहार तक आ गए.
[image error] जब हम हापुड़ जा रहे थे तो कथित राष्ट्रीय राजमार्ग पर सैंकड़ों बाइकर्स कलाबाजियां दिखाते हुए सड़क पर आड़े तिरछे भागे चले जा रहे थे. मुझे उनको देखकर कोई प्रसन्नता न हुई. मेरे जैसा व्यक्ति जिसके मन और अनुभवों में बहुत सारा रेगिस्तान बसा हुआ है, वह कभी भी महानगरों को नहीं समझ पायेगा. मेरे लिए राष्ट्रीय राजमार्ग का अर्थ है अस्सी फीट चौड़ी सड़क और सौ किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की गति. मेरे लिए दूर तक पसरा हुआ सूनापन ज़िन्दगी है.
शैलेश भारतवासी कहते हैं सब लोग नौकरी करके गाज़ियाबाद को लौट रहे हैं. मैं उनको देख रहा था. वे अपनी बाइक से कारों और बड़े ट्रकों के बीच फिसल रहे थे. असल में उनका भागना ऐसा था जैसे किसी नरक की दीवार में सुराख करके आये हैं. नरक के पहरेदार उनके पीछे लगे हैं. वे हर सूरत में हाथ नहीं आना चाहते हों. लेकिन वे कल सुबह फिर से लौटेंगे. दिल्ली शहर.
एक रोज़ आदमी की पीठ लोहे की पटरी में ढल जाएगी.
धूप की तपिश में चमकती कोहरे के दिनों में खोई-खोई . बारिशों में फिसलन भरी. मन मगर मर चुका होगा. एक रोज़ लोहे के फूल चूमेंगे धूप में भीगे होठ. और इस आग ही आग में दुनिया लौट जाएगी वहीँ जहाँ से शुरू हुई थी.
मैंने कितने लोगों से मोहोब्बत की है ये हिसाब बेमानी है. जैसे हर किसी के पास है कहानियां. जैसे हर कोई कविता की तरह चलता है. ज़िन्दगी मगर ज़िन्दगी है, जिस ढब देखिये.
मैंने इस कहानी के कोई पंद्रह सत्रह पन्ने सुने. इसी कथावाचन और श्रवण में हम हापुड़ से दिल्ली के मयूर विहार तक आ गए.
[image error] जब हम हापुड़ जा रहे थे तो कथित राष्ट्रीय राजमार्ग पर सैंकड़ों बाइकर्स कलाबाजियां दिखाते हुए सड़क पर आड़े तिरछे भागे चले जा रहे थे. मुझे उनको देखकर कोई प्रसन्नता न हुई. मेरे जैसा व्यक्ति जिसके मन और अनुभवों में बहुत सारा रेगिस्तान बसा हुआ है, वह कभी भी महानगरों को नहीं समझ पायेगा. मेरे लिए राष्ट्रीय राजमार्ग का अर्थ है अस्सी फीट चौड़ी सड़क और सौ किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की गति. मेरे लिए दूर तक पसरा हुआ सूनापन ज़िन्दगी है.
शैलेश भारतवासी कहते हैं सब लोग नौकरी करके गाज़ियाबाद को लौट रहे हैं. मैं उनको देख रहा था. वे अपनी बाइक से कारों और बड़े ट्रकों के बीच फिसल रहे थे. असल में उनका भागना ऐसा था जैसे किसी नरक की दीवार में सुराख करके आये हैं. नरक के पहरेदार उनके पीछे लगे हैं. वे हर सूरत में हाथ नहीं आना चाहते हों. लेकिन वे कल सुबह फिर से लौटेंगे. दिल्ली शहर.
एक रोज़ आदमी की पीठ लोहे की पटरी में ढल जाएगी.
धूप की तपिश में चमकती कोहरे के दिनों में खोई-खोई . बारिशों में फिसलन भरी. मन मगर मर चुका होगा. एक रोज़ लोहे के फूल चूमेंगे धूप में भीगे होठ. और इस आग ही आग में दुनिया लौट जाएगी वहीँ जहाँ से शुरू हुई थी.
मैंने कितने लोगों से मोहोब्बत की है ये हिसाब बेमानी है. जैसे हर किसी के पास है कहानियां. जैसे हर कोई कविता की तरह चलता है. ज़िन्दगी मगर ज़िन्दगी है, जिस ढब देखिये.
Published on November 24, 2016 11:03
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