कभी इस तरह थाम सकोगे


के सी18 mins · 


टिंग टिंग टिंग ट्विंग सेलफोन में कोई वाद्य बजता रहता है. स्क्रीन एक बार नीला होने के बाद चमकने लगता है. अंगुलियाँ फोन नहीं उठाती. आँखें टेबल पर पड़े फोन को देखती रहती है.
दोपहर की गहरी नींद ढली हुई शाम में खुलती है. रात आये ब्रश करते हुए. कई दिनों की बाकी शेव पर रेजर फिराते. कस्तूरी की गंध का आफ्टर शेव हथेली में लिए आईने में देखना. शोवर के नीचे खड़े हुए पानी की बूंदों को पीठ पर गिरते हुए महसूस करना. कुछ महीनों की गर्द से भरे काले जूतों को झाड़ कर सफ़ेद जुराबें खोजना. साल दो हज़ार ग्यारह की ख़ुशबू से भरी एक चेक वाली कमीज एनयू 87 और खाकी ट्राउजर.
ड्रेसअप होकर कहाँ जाओगे? ड्रिंक लेने?
बालकनी में खड़े यही सवाल दिल में आया था. कल रात उस वक़्त दस बजकर बारह मिनट हुए थे. * * *
ज़िन्दगी एक कहानी है. ये बहुत जगह स्किप होती रहती है. जीए हुए पलों की तस्वीर से बहुत से सीन गायब रहते हैं.
याद के नन्हे गुरिल्ला सिपाही हमला करके छुप जाते हैं.
अचानक चौंक कर बहुत पीछे किसी तनहा लम्हे में दूर तक फैली रेत पर बैठे हुए ख़ुद को याद आता हूँ. वह लगभग पूरे आसमान को देखने की एक रात थी. तारे थे. उतने ही साफ़ जितने किसी सूने रेगिस्तान की रात में होते हैं. किसी तरफ उफ़क के पास एक धुंधली लकीर थी. यही एक रूमानी बात थी.
कभी-कभी आप चाहते हैं कि रेत किसी नाज़ुक छुअन भरे दरिया की तरह बहने लगे. आप उसकी बाँहों में समा जाएँ.
ज़िन्दगी में अकेले जीना अच्छा होता है मगर कभी-कभी अच्छा नहीं होता. उस कभी-कभी में प्यास को पानी में फेंकते जाना और हाँफते जाना होता है. वही उस कभी-कभी की टूटन की मरम्मत होता है. * * *
एक सुबह उसकी बाहों में जागने पर याद न आया कि दुनिया के किस कोने में पड़े हैं.
मगर बाद बरसों के अचानक याद आता है. जब वह अपना गोल सा चेहरा गरदन के पास रख देती थी न. तब लगता था कि कोई ऊन का गोला है. जिससे रह रहकर गुनगुनी भाप सी हवा आती है.
वह जहाँ रहती थी, कस्बे की अनेक हवेलियों के बीच की एक हवेली थी. उसके सबसे ऊपरी हिस्से में अनेक कमरे थे. वह जिस कमरे में रहती थी. वही एक कमरा था. जिसमें कोई रहता था. उसका कहना था कि ये लम्बी खुली छत कितनी सुकूनदेह और कितनी डरावनी है. मैं कभी बता नहीं सकती. उसने ये भी कहा था कि जब आते हो न तभी यहाँ दो लोग होते थे.
कई-कई बार के आने में एक बार के आने पर उसने कहा था- "मुझे कभी इस तरह थाम सकोगे कि मुझे लगे तुम्हें हमेशा के लिए मेरी ज़रूरत है."
बाद सालों के हँसते हुए किसी ने गाली दी थी- कैसोनोवा. * * *
नशे के बारे में शायद तुम जानते नहीं हो. ये कैसी तलब होता है और इसकी ज़रूरत क्योंकर होती है.
मैं जानता हूँ. मगर इन दिनों कुछ नहीं करता. * * *
शायद कल की रात, कोई भीगा नशीला सिरा पकड़ना था. मगर वह बीत गयी. उम्र की घड़ी तेज़ चल रही है. कि बीती जिंदगी की दो बातें लिखने में भी दो घंटे चले जाते हैं.
दस मिनट लिखने के बाक़ी उसे याद करते हुए खो जाने के. * * *
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Published on July 31, 2017 02:47
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Kishore Chaudhary
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