मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो. * * *
मेरी आँखों में
मेरे होठों पर
मेरे चश्मे के आस पास
तुम्हारी याद की कतरनें होनी चाहिए थी.
लेकिन नहीं है.

ऐसा हुआ नहीं या मैंने ऐसा चाहा नहीं
जाने क्या बात है?
* * *

मैं नहीं सोचता हूँ
गुमनाम ख़त लिखने के बारे में.
मेरे पास कागज़ नहीं है
स्याही की दावत भी
एक अरसे से खाली पड़ी है.

एक दिक्कत ये भी है
कि मेरे पास एक मुकम्मल पता नहीं है.
* * *

कल रात तुम्हें शुभ रात कहने के
बहुत देर बाद तक नींद नहीं आई.

मैं सो सकता था
अगर
मैंने ईमान की किताबें पढ़ीं होती

मुझे किसी कुफ़्र का ख़याल आता
मैं सोचता किसी सज़ा के बारे में
और रद्द कर देता, तुम्हें याद करना.

मैं अनपढ़ तुम्हारे चेहरे को
याद में देखता रहा
न कुछ भूल सका, न सो पाया.

कल रात तुम्हें शुभ रात कहने के बहुत देर बाद तक.
* * *

तुमको
पहाड़ों से बहुत प्रेम था.

तुम अक्सर मेरे साथ
किसी पहाड़ पर होने का सपना देखती थी

ये सपना कभी पूरा न हो सका
कि पहले मुझे पहाड़ पसंद न थे
फिर तुमको मुझसे मुहब्बत न रही.

आज सुबह से सोच रहा हूँ
कि तुम अगर कभी मिल गयी
तो ये किस तरह कहा जाना अच्छा होगा?

कि मैं
एक पहाड़ी लड़की के प्रेम पड़ गया हूँ.

फिर अचानक डर जाता हूँ
अगर तुमको ये बात मालूम हुई
तो एक दूजे से मुंह फेरकर जाते हुए
हम ऐसे दिखेंगे
जैसे पहाड़ गिर रहा हो
रेत के धोरे बिखर रहे हों
समन्दर के भीतर कुछ दरक रहा हो.

और आखिरकार मैं पगला जाता हूँ
कि मैंने उस पहाड़ी लड़की को अभी तक कहा नहीं है
कि मैं तुमसे प्रेम करता हूँ.

हमारे बीच बस इतनी सी बात हुई है
कि एक रोज़
वह मेरे घुटनों पर अपना सर रखकर रोना चाहती है.
* * *

मैं कितना नादान था।

हर बात को इस तरह सोचता रहा
जैसे हमको साथ रहना है, उम्रभर।

दफ़अतन आज कुछ बरस बाद
हालांकि तुम मेरे सामने खड़ी हो।

तुमको देखते हुए भी
नहीं सोच पा रहा हूँ
कि एक रोज़ तुम अपने नए प्रेमी के साथ
इस तरह रास्ते मे मिल सकती हो।

तुम पूछा करती थी
क्या हम कभी एक साथ हो सकते हैं?

मैं हंसकर कहता-
कि क्या नहीं हो सकता इस दुनिया में।

अब सोचता हूँ
कि सचमुच क्या नहीं हो सकता इस दुनिया में।

मैं कितना नादान था।

[Painting courtesy : Jean Haines]
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Published on August 11, 2017 23:59
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Kishore Chaudhary
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