प्रेम का जाने क्या होता है
सायकिल के कॅरियर पर बैठे
उनींदे बच्चे के पांव से गिरे
कच्चे हरे नीले रंग के जूते की तरह।
अक्सर कहीं पीछे छूट जाता है, प्रेम।
* * *
मैं चलते हुए अचानक रुक गया. जैसे कोई चिट्ठी जेब से गिर गयी. मुझे बहुत सालों से किसी ने चिट्ठी लिखी न थी. मैंने रेत में चारों तरफ देखा. वहां कोई चिट्ठी न थी. कोई कागज़ का टुकड़ा भी न था. एक काला मोती, सोने जैसी रेत में पड़ा था. अचानक मुझे याद आया कि उसके नाक पर बेढब तरीके से बैठा काला तिल सुन्दर दिखता है. उसके बच्चे बड़े हो गए हैं. मगर वह तिल उतना ही वहीँ ठहरा हुआ है.
मैंने कभी उससे नहीं कहा कि तुम्हारे नाक पर ये तिल कैसा लगता है. उसका वहां होना ही ठीक था. जैसे हम दोनों का एक साथ होते हुए भी एक साथ न होना ठीक था. ऐसे ही रेत में पड़ा काला मनका रेत के साथ होने पर ही सुन्दर था.
जाने क्यों प्रेम भी काले मोती की तरह रेत में सुन्दर दीखता तो है मगर बहुत जल्द खो जाता है.
* * *
छोटी नीली चिड़िया को
चाहिए होती है जितनी जगह
एक पतली सी टहनी पर।
सबको
बस उतना सा प्यार चाहिए होता है।
* * *
मेरी ज़रूरतें बहुत कम है
और तुम बहुत से अधिक हो।
मेरे लिए
तुम्हारा थोड़ा सा साथ
काफी से बढ़कर होता है।
* * *
शुक्रिया कहने का सलीका
नहीं सीखा जा सका, मुझसे।
मेरे पास तुम्हारे लिए, सदा भीगे होठ रहे।
* * *
तुमसे जो भी मिला
वह चाहना से ज्यादा निकला।
मिलने की बेचैनी बहुत गहरी रही
तुमसे बिछड़कर आंसू टूटकर बहे।
* * *
ठेलों पर पड़े
पुराने कपड़ों की तरह
पुराना प्रेम
बचा रहा स्मृति के खटोले पर।
* * *
समय रुक नहीं जाता था
घड़ी के बंद हो जाने पर।
इसलिए हम चाबी भरते रहे।
रुक गए प्रेम को
आगे बढ़ाने की जुगत न मिली।
* * *
पंछी उड़कर
फिर लौट आता है घोंसले पर।
कभी अचानक
हमेशा के लिए नहीं भी आता।
प्रेम का जाने क्या होता है।
* * *
धूप में पड़ी कुर्सी
एक दिन मर गयी।
दिल मे छुपाकर रखा प्रेम भी नहीं बचा।
* * *
प्रेम नदी के बीच का सफेद भंवर न था. वह भूरे पहाड़ की स्याह उपत्यका भी न था. उसने कहा- "आप मिलने के बाद भूल जाते हो" मैंने बहुत देर तक सोचा. मैं कितना खराब आदमी हूँ. इस तरह साथ होता हूँ जैसे इसके सिवा कहीं का नहीं हूँ. फिर इस तरह चला जाता हूँ कि जैसे कुछ था ही नहीं.
कमसिन लड़कियां और लड़के कभी नहीं समझ पाते कि उनकी ज़रूरत क्या है.
मैं जो समझता हूँ, वह तुम न समझो तो अच्छा है. प्रेम-प्रेम करना बड़ा रूमानी काम है. लेकिन दोस्त मुझे सिर्फ तुम्हारी ज़रूरत होती है. इतना समझ आता है. इसमें कितना प्रेम है? इस बारे में मैंने कभी सोचा नहीं.
तुम भी अगर न सोचोगे तो सुख पाओगे.
* * *
उनींदे बच्चे के पांव से गिरे
कच्चे हरे नीले रंग के जूते की तरह।
अक्सर कहीं पीछे छूट जाता है, प्रेम।
* * *
मैं चलते हुए अचानक रुक गया. जैसे कोई चिट्ठी जेब से गिर गयी. मुझे बहुत सालों से किसी ने चिट्ठी लिखी न थी. मैंने रेत में चारों तरफ देखा. वहां कोई चिट्ठी न थी. कोई कागज़ का टुकड़ा भी न था. एक काला मोती, सोने जैसी रेत में पड़ा था. अचानक मुझे याद आया कि उसके नाक पर बेढब तरीके से बैठा काला तिल सुन्दर दिखता है. उसके बच्चे बड़े हो गए हैं. मगर वह तिल उतना ही वहीँ ठहरा हुआ है.
मैंने कभी उससे नहीं कहा कि तुम्हारे नाक पर ये तिल कैसा लगता है. उसका वहां होना ही ठीक था. जैसे हम दोनों का एक साथ होते हुए भी एक साथ न होना ठीक था. ऐसे ही रेत में पड़ा काला मनका रेत के साथ होने पर ही सुन्दर था.
जाने क्यों प्रेम भी काले मोती की तरह रेत में सुन्दर दीखता तो है मगर बहुत जल्द खो जाता है.
* * *
छोटी नीली चिड़िया को
चाहिए होती है जितनी जगह
एक पतली सी टहनी पर।
सबको
बस उतना सा प्यार चाहिए होता है।
* * *
मेरी ज़रूरतें बहुत कम है
और तुम बहुत से अधिक हो।
मेरे लिए
तुम्हारा थोड़ा सा साथ
काफी से बढ़कर होता है।
* * *
शुक्रिया कहने का सलीका
नहीं सीखा जा सका, मुझसे।
मेरे पास तुम्हारे लिए, सदा भीगे होठ रहे।
* * *
तुमसे जो भी मिला
वह चाहना से ज्यादा निकला।
मिलने की बेचैनी बहुत गहरी रही
तुमसे बिछड़कर आंसू टूटकर बहे।
* * *
ठेलों पर पड़े
पुराने कपड़ों की तरह
पुराना प्रेम
बचा रहा स्मृति के खटोले पर।
* * *
समय रुक नहीं जाता था
घड़ी के बंद हो जाने पर।
इसलिए हम चाबी भरते रहे।
रुक गए प्रेम को
आगे बढ़ाने की जुगत न मिली।
* * *
पंछी उड़कर
फिर लौट आता है घोंसले पर।
कभी अचानक
हमेशा के लिए नहीं भी आता।
प्रेम का जाने क्या होता है।
* * *
धूप में पड़ी कुर्सी
एक दिन मर गयी।
दिल मे छुपाकर रखा प्रेम भी नहीं बचा।
* * *
प्रेम नदी के बीच का सफेद भंवर न था. वह भूरे पहाड़ की स्याह उपत्यका भी न था. उसने कहा- "आप मिलने के बाद भूल जाते हो" मैंने बहुत देर तक सोचा. मैं कितना खराब आदमी हूँ. इस तरह साथ होता हूँ जैसे इसके सिवा कहीं का नहीं हूँ. फिर इस तरह चला जाता हूँ कि जैसे कुछ था ही नहीं.
कमसिन लड़कियां और लड़के कभी नहीं समझ पाते कि उनकी ज़रूरत क्या है.
मैं जो समझता हूँ, वह तुम न समझो तो अच्छा है. प्रेम-प्रेम करना बड़ा रूमानी काम है. लेकिन दोस्त मुझे सिर्फ तुम्हारी ज़रूरत होती है. इतना समझ आता है. इसमें कितना प्रेम है? इस बारे में मैंने कभी सोचा नहीं.
तुम भी अगर न सोचोगे तो सुख पाओगे.
* * *
Published on August 27, 2017 10:20
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