"तुम आ जाओ। तुम्हारा इंतज़ार है।" ऐसा कहने वाले ने आने का रास्ता भी रखा हो, ये ज़रूरी नहीं होता। उसने किसी पुरानी बात को याद करके महज इसलिए कह दिया होगा कि वह ख़ुद को ग़लत साबित न करना चाहता होगा।
हम इस लम्हे को सच जानते हैं। किसी आवेश में कह देते हैं कि तुम्हारे लिए हमेशा हूँ। एक घड़ी में हमारा मन बदल जाता है। फिर हम कभी इतने सच्चे और हिम्मती नहीं होते कि उसे कह दें। अब वो मन न रहा। जाने किस मोह में मैंने ऐसा सोच लिया कि सबकुछ हमेशा के लिए हो सकता है।
बातें और रिश्ते कभी-कभी पारदर्शी कांच बन जाते हैं। उनके आगे का संसार दिखता तो है मगर वहां तक जाने का कोई रास्ता नहीं होता।
हम सम्बन्ध की इति को नहीं स्वीकारते और भँवरे की तरह बन्द रास्ते के पार पहुंचने की आस में वहीं टूट बिखर जाते हैं।
Published on October 21, 2017 18:26