इत्ती सी बात है
शाम बुझ गयी है
मैं छत पर टहलता हूँ
अपने चप्पलों से
एड़ी को थोड़ा पीछे रखे हुए।
सोचता हूँ कि
समय से थोड़ा सा पीछे छूट रहा हूँ।
हालांकि फासले इतने बढ़ गए हैं
कि नंगे पांव रुककर
इंतज़ार करूँ, तो भी कुछ न होगा।
* * *
कितना अच्छा होता
कि जूते और चप्पल समय के साथ चले जाते
हम वहीं ठहरे रह जाते, जहाँ पहली बार मिले थे।
फिर सोचता हूँ कि न हुआ ऐसा
तो अच्छा ही हुआ
तुम वैसे न थे, जैसा पहली बार सोचा था।
* * *
क्या होगा अगर हम मिले?
जिस तरह रेल के इंतज़ार में
फाटक बंद रहता है
मन उसकी प्रतीक्षा करता है।
रेल के आने पर
रात में पटरियां चमकती हैं
एक धड़क सुर साधती है।
तपी हुई पटरियां धीरे से ठंडी हो जाती है।
इसी तरह हम क्या करेंगे मिलकर।
कोई रेल की तरह आगे निकल जायेगा
कोई पटरी की तरह इंतज़ार में पड़ा रहेगा।
* * *
मुझे तुम्हारी हंसी पसन्द है
हंसी किसे पसन्द नहीं होती।
तुम में हर वो बात है
कि मैं पानी की तरह तुम पर गिरूं
और भाप की तरह उड़ जाऊं।
मगर हम एक शोरगर के बनाये
आसमानी फूल हैं
बारूद एक बार सुलगेगा और बुझ जाएगा।
इत्ती सी बात है।
* * *
पता नहीं वह कौनसा शहर था
शायद मुम्बई ही होगा
मगर ये याद है
कि तुमने कहा था, रम अच्छी है
ये हमारी मदद करेगी।
मुझे रम बिल्कुल नहीं पसन्द
मैंने सब जाड़े व्हिस्की के साथ बिताए।
कैसी बात है न
फिर भी मुस्कुराता हूँ
कि तुम रम पिये हो और मेरे साथ हो।
* * *
मैं छत पर टहलता हूँ
अपने चप्पलों से
एड़ी को थोड़ा पीछे रखे हुए।
सोचता हूँ कि
समय से थोड़ा सा पीछे छूट रहा हूँ।
हालांकि फासले इतने बढ़ गए हैं
कि नंगे पांव रुककर
इंतज़ार करूँ, तो भी कुछ न होगा।
* * *
कितना अच्छा होता
कि जूते और चप्पल समय के साथ चले जाते
हम वहीं ठहरे रह जाते, जहाँ पहली बार मिले थे।
फिर सोचता हूँ कि न हुआ ऐसा
तो अच्छा ही हुआ
तुम वैसे न थे, जैसा पहली बार सोचा था।
* * *
क्या होगा अगर हम मिले?
जिस तरह रेल के इंतज़ार में
फाटक बंद रहता है
मन उसकी प्रतीक्षा करता है।
रेल के आने पर
रात में पटरियां चमकती हैं
एक धड़क सुर साधती है।
तपी हुई पटरियां धीरे से ठंडी हो जाती है।
इसी तरह हम क्या करेंगे मिलकर।
कोई रेल की तरह आगे निकल जायेगा
कोई पटरी की तरह इंतज़ार में पड़ा रहेगा।
* * *
मुझे तुम्हारी हंसी पसन्द है
हंसी किसे पसन्द नहीं होती।
तुम में हर वो बात है
कि मैं पानी की तरह तुम पर गिरूं
और भाप की तरह उड़ जाऊं।
मगर हम एक शोरगर के बनाये
आसमानी फूल हैं
बारूद एक बार सुलगेगा और बुझ जाएगा।
इत्ती सी बात है।
* * *
पता नहीं वह कौनसा शहर था
शायद मुम्बई ही होगा
मगर ये याद है
कि तुमने कहा था, रम अच्छी है
ये हमारी मदद करेगी।
मुझे रम बिल्कुल नहीं पसन्द
मैंने सब जाड़े व्हिस्की के साथ बिताए।
कैसी बात है न
फिर भी मुस्कुराता हूँ
कि तुम रम पिये हो और मेरे साथ हो।
* * *
Published on October 19, 2017 18:22
No comments have been added yet.
Kishore Chaudhary's Blog
- Kishore Chaudhary's profile
- 16 followers
Kishore Chaudhary isn't a Goodreads Author
(yet),
but they
do have a blog,
so here are some recent posts imported from
their feed.

