ऊधो, मन माने की बात
कच्ची धूप आ गयी है। चारपाई पर बैठ कर आभा कक्षा छठी की हिंदी की उत्तर पुस्तिकाएं जाँचने लगी। पहला वस्तुनिष्ठ प्रश्न था। सूर के पद किस भाषा में हैं। मेरी ओर देखते हुए कहती हैं- "सूर की भाषा"मुझे लगता है बिना पूछे ही प्रश्न कर लिया है। हिंदी साहित्य का कक्षा से अधिकांश अनुपस्थित रहा विद्यार्थी तुरन्त उत्तर देता है- "ब्रज भाषा" मेरा उत्तर सुनकर सन्तुष्ट हो जाती हैं। उत्तर पुस्तिकाएं जाँचने लगती हैं। इस कार्य के बीच आँख उठाकर मुझे देखती हैं। जैसे कह रही हों कि आपकी यही दुनिया है मोबाइल और सोशल साइट्स।
ये समझकर मैं आरम्भ हो जाता हूँ।
मधुप करत घर कोरि काठ में, बंधत कमल के पात॥ज्यों पतंग हित जानि आपुनो दीपक सो लपटात।सूरदास, जाकौ जासों हित, सोई ताहि सुहात॥
पद को उदघोषक की तरह स्पष्ट शब्द स्वर में पढ़ता हूँ। वे मेरी ओर देखती हैं। मैं व्याख्या करने लगता हूँ। भ्रमर सूखी लकड़ी में घर बनाना है किंतु वह कमल की पंखुड़ियों में क़ैद हो जाता है। जैसे पतंगा अपना हित समझकर स्वयं दीपक की लौ से लिपट जाता है। सूर जिसका जिसमें हित अथवा मन होता है उसे वही सुहाता है।
अभी तक सब कुशल मंगल है।
[Picture credit : Parul Pukhraj]
Published on December 25, 2017 22:51
No comments have been added yet.
Kishore Chaudhary's Blog
- Kishore Chaudhary's profile
- 16 followers
Kishore Chaudhary isn't a Goodreads Author
(yet),
but they
do have a blog,
so here are some recent posts imported from
their feed.

