ओ शैदाई !

शैदा का अर्थ है जो किसी के प्रेम में डूबा हो.
सोचता हूँ कि मैं किसका शैदाई हूँ. सतरंगी तितलियों, बेदाग़ स्याह कुत्तों, चिट्टी बिल्लियों, भूरे तोतों, कलदुमी कबूतरों, गोरी गायों, चिकने गधों, ऊंचे घोड़ों, कसुम्बल ऊँटों से भरे इस संसार में कोई ऐसा न था, जिसके लिए जागना-सोना किया. पढने-लिखने में कोई तलब इस तरह की न थी जिसके बारे में बरसों या महीनों सोचा हो कि ऐसा हो सका तो वैसा करेंगे. रास्ता कोई ऐसा याद नहीं पड़ता जिस पर चलने के लिए बेक़रार रहा. मंज़िल भी कोई ऐसी न थी जहाँ पहुँच जाने लिए टूट कर चाहता रहा हूँ. हाँ कभी-कभी जहाँ जाना चाहा वह मेरे नाना का घर था.
मेरे नाना के घर में बहुत सारी बिल्लियाँ थीं.
उनके पास एक चिलम थी. एक ज़र्दा रखने की तिकोनी पोटली थी. चिलम को उल्टा करते तो एक काला पत्थर उसके मुंह से बाहर गिरता था. नाना उसे दो-तीन बार आँगन पर पटकते, अँगुलियों से सहलाते और वापस चिलम के मुंह में रख देते थे. उस चिलम की गंध नाना के कपड़ों से आया करती थी. नाना और चिलम की गंध एक ही थी. मुझे लगता था कि नाना चिलम के शैदाई हैं.
नाना ने किसी रोज़ चिलम को किनारे रख दिया. उनकी बंडी की अगली जेब में एक पुड़िया रखी रहने लगी. उसमें अमल रखा रहता था. नाना ने अमल से मोहब्बत कब की मुझे याद नहीं. इसलिए कि ये उनके आख़िरी बरस थे और तब तक मैं बाहर पढने और फिर नौकरी करने चला गया था. मुझे उन बरसों के नाना बिलकुल याद नहीं है. मैं पिछले बरसों की याद में लम्बी सफ़ेद दाढ़ी, तेवटा, बंडी और कुरता देख पाता हूँ. उनका पोतिया अक्सर ढीला रहता था. वे उसके साथ बेरुखी से पेश आते थे.
नाना एक विवाह में गए. सुबह जब नहाकर आये तो पाया कि बंडी की अगली जेब से अमल का मेणीया गायब है. नाना ने गहरे गुस्से में डेरे पर उद्घोष किया- "सगों के घर में मुझ सत्तर साल के आदमी से कोई मजाक करे ये हद है. आज के बाद इस अमल के पीछे सात धोबे धूड़" उन्होंने उस दिन के बाद से न कभी अमल लिया न चिलम की ओर मुंह किया.
वे बहुत उदास हो गए थे और उनका जी दुनिया से उचट गया था. अक्सर अकेले रहते. कम बोलते और खेतों के दूर तक चक्कर लगाया करते. वे ऐसे ही उदास गुज़र गए.
सोचता हूँ कि कभी नाना चलते-चलते जब अचानक रुक जाते होंगे तब उनको चिलम की पुकार सुनाई पड़ती होगी- "ओ शैदा मुंह लगाओगे या नहीं"
मैं किसका शैदाई था? दुबली सी लड़की या विल्स नेविकट की खराश, सुघड़ व्हिस्की से उठती मादक गंध या फिर उदासी से भरा कोई एकांत या रोने के लिए बनी खुली जगह? ऐसी कौनसी चीज़ थी जिसके लिए मैं शैदाई रहा होऊंगा. मैं अतीत में फिसलता हूँ मगर याद नहीं आता. जो कुछ याद आता है उसमें जिस किसी से मोहब्बत थी और वह जब मेरी शर्त से बाहर हुई तो उसे ठुकरा दिया.
दो रोज़ से बेचैन हूँ. मुझे समझ ही नहीं आता कि मैं कर क्या कर हूँ? ज़रा रूककर सोचता हूँ कि देखो कितने लोग इस रास्ते से आये और सदा के लिए चले गए. दुनिया मगर इसी तरह चल रही. क्या इसी तरह ऐसा नहीं हो सकता कि मैं सीख जाऊं कि कितने ही अफ़सोस इस दिल में आये और चले गए. दिल पहले की तरह चलता रहेगा. लेकिन मैं अपनी प्रिय चीज़ों से दूर भागता हूँ. उनको सदा के लिए ठुकरा देने के ख़याल से भरा अजगर की तरह अपने मन को कुंडली बनाये रगड़ता रहता हूँ. मैं जानता हूँ कि इस तरह एक बार फिर वैसा हो जाऊँगा. नीम पागल, बेचैन, बेक़रार और उदासी के बतुलिये में उड़ते आक के टूटे पत्ते सा... मगर क्या करूँ?
अली अकबर नातिक़ की लोककथाओं सरीखी दो कहानियों में नायक अपनी पालतू कुतिया और दो कुत्तों के शैदाई हैं. वे उनके लिए जीते हैं और उनके लिए मरते हैं. जीवन का ऐसा खाका केवल वे बातपोश खींच सकते हैं जिन्होंने अपने नाना-नानी से कहानियां सुनी हो. जिन्होंने मजदूरी और खेती की हों.
मुझे भी कभी नसीब हो कि ऐसे किसी लोककथा से प्रेम में पड़ जाऊं. कोई पूछे- "शैदा अब क्या होगा?" कोई जवाब न देकर मैं चुप देखता रहूँ कि घर की बाखल में हवा भंवर खा रही है. झोकाणे में ऊंट शांत बैठा है. भेड़ों के गले बंधी पीतल की घंटियाँ बज रही हैं. गुडाल के किसी कोने में बिल्लियाँ ऊंघ रही हैं. बच्चे किसी खेल में रमे हैं. ज़िन्दगी की भागदौड़ खत्म हो गयी है.
मैं इस तेज़ रफ़्तार ज़िन्दगी को शाप देता हूँ.
आमीन.
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Published on January 13, 2018 02:50
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Kishore Chaudhary
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