जनाब खुंदस नापा करो बिल से कागज़ पे पेला जाता है जात को, जात नकारा हरामज़ात नकारा मधुमखी बज़्ज़ से जहां केला जाता है रात को, रात सी हसीन हम भी ठहरें हुनर पहचाने नहीं ज़ोर है पहचाना हरामखोर हैं, इतना देते रहे तो कमबख्त हुए इश्क़ हुआ ज़बरदस्त हुए विश्क हुआ इन्द्रप्रस्त हुए।
Published on November 16, 2021 19:21