गिद्धभोज
'गिद्धभोज' कोई एक कहानी नहीं है, बल्कि पंद्रह कहानियों का संगम है। यह वे कहानियां हैं जो सीधे हमसे जुड़ी हैं, हमारे आसपास मौजूद माहौल से जुड़ी हैं— हमारी परेशानियों, हमारी जड़ विचारधाराओं, हमारे भूत और हमारे भविष्य से जुड़ी हैं। हर कहानी हमें झकझोरती है, एक सीख देती है, यह हम पे निर्भर करता है कि हम इनसे क्या सीख पाते हैं।
मुख्य कहानियों में 'गिद्धभोज' है जो 'अन्नदाता' के भारी भरकम मगर खोखले विशेषण से नवाजे गये एक ऐसे किसान की कहानी है जो भुखमरी के कगार पर है और अपना जीवन खत्म कर लेने पर उतारू है लेकिन किस्मत उसे एक मौका देती है जहां उसे एक मुश्किल चयन करना पड़ता है कि वह एक मसीहा बन जाये या एक साधारण इंसान और वो साधारण इंसान ही बनना मंजूर करता है। 'अपराधबोध' एक ऐसे युवा की कहानी है जो सोशल मीडिया के भ्रामक प्रचार-प्रसार से भ्रमित, दिशाहीन हो कर अपने भविष्य से खिलवाड़ करता एक हत्यारा बन जाता है लेकिन उसका अपराधबोध उसे कहीं भी चैन नहीं लेने देता।
‘एक नई भोर’ इस संकलन की तीसरी कहानी है जो मौत की दहलीज तक पहुंच चुकी युवती के अंदर एक रोशनी की तरह पैदा होती है और वह मरने से इनकार कर देती है। लोग उसे शर्मिंदा करना चाहते थे, हराना चाहते थे मगर वह चट्टान की तरह खड़ी हो जाती है अपने साथ हुए हर अन्याय का जवाब देने के लिये।
'वह कौन थी' एक ऐसी लड़की की बेचैन आत्मा की कहानी है, जिसकी मौत तक अंधेरे में दफन कर दी गई थी और अगर वह ख़ुद न कोशिश करती तो यह कभी न सामने आ पाता कि उसके साथ क्या हुआ था। बदकिरदार' चरित्र से जुड़ी आकांक्षाओं और वर्जनाओं को ढोती हर उस औरत की दास्तान है जो अपने हिस्से का शायद एक पल भी अपनी इच्छा से नहीं जी पाती और यह चरित्र आधारित दमन उसे विद्रोह पर उकसा कर अंततः अपने मन की कर लेने पर मजबूर कर देता है।
‘सुर्खाब’ मुस्लिम मआशरे में मौजूद लैंगिक भेदभाव को दर्शाती एक ऐसी कहानी है जहां एक लड़की अपने हक और बराबरी के मौके पाने के लिये लगातार जूझते हुए अपना घर तक छोड़ने पर मजबूर हो जाती है। 'अधूरी आजादी' इसी दौर के उस संघर्ष की कहानी है जहां पश्चिम की अंधाधुंध नकल के चक्कर में सामने दिखती पश्चिमी आजादी और अपने सेक्स प्रतिबंधित भारतीय समाज की वर्जनाओं के द्वंद्व में फंसी युवा पीढ़ी अपनी यौन कुंठाओं को तृप्त करने के पीछे छोटी-छोटी बच्चियों के शिकार से भी गुरेज नहीं कर रही।
'दो बूँद पानी' लगातार कम होते पानी के पीछे होने वाले उस संघर्ष की कहानी है जहां एक वक्त ऐसा भी आता है कि पानी की एक बूंद भी बेशकीमती हो जाती है और हम सभी को अंत पंत यह नर्क भोगना ही है। 'गर्म गोश्त का शौकीन' पैसे और पॉवर के गुरूर में सर से पांव तक डूबे उस शख्स की कहानी है जिसके लिये हर जनाना बदन बस एक 'योनि' ही है, इससे इतर कुछ नहीं।
'जंगल का आदमी' हर उस मूल मानव की दास्तान है जो अपनी जमीन और जंगल को बचाने के लिये विकास के नाम पर खड़े हुए पूंजीवादी सिस्टम से टकरा रहा है। 'पगली' जाति और धर्म आधारित जड़ आस्थाओं के खिलाफ जाती एक ऐसी प्रेम कथा है जहां रूढ़ियों से जकड़ी मशीनें इंसानी रिश्तों की अहमियत समझने की जगह उसे खत्म कर देने पर उतारू हैं।
जामुन की छाँव' उस दौर की कथा है जहां बेशुमार बढ़ती आबादी की जरूरतों के मद्देनजर हरियाली की बलि लेते-लेते हम अपने इको सिस्टम को ही वेंटिलेटर पर पहुंचा देते हैं। 'आकर्षण' कलर बायसनेस को ले कर रची एक कथा है जिसमें एक सांवली लड़की इस सामाजिक पूर्वाग्रह को खुद पर झेलते इस तरह बड़ी होती है कि अपनी ख्वाहिशें दर्शाने के लिये भी उसे दूसरों से ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। 'खामोश बगावत' संविधान प्रदत्त उस सुविधा का एक ऐसा पहलू है, जिसकी तरफ बहुत कम लोग देखते हैं कि कैसे ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ लड़ी जाने वाली लड़ाई खुद उसी विकार से संक्रमित हो रही है।
'इद्दत एक व्यथा' इस्लामिक मान्यताओं में से एक मान्यता के उस स्याह पहलू को दर्शाती है जहां एक औरत के लिये इम्तिहान ही इम्तिहान हैं तो मर्दों के लिये इसी मरहले पर एक रत्ती आजमाईश नहीं। यह अप्रासंगिक हो चुके रिवाजों को संशोधित करने के लिये की जाने वाली लड़ाई है जो औरत को अकेले लड़नी पड़ती है।
Giddhbhoj
Ashfaq Ahmad
मुख्य कहानियों में 'गिद्धभोज' है जो 'अन्नदाता' के भारी भरकम मगर खोखले विशेषण से नवाजे गये एक ऐसे किसान की कहानी है जो भुखमरी के कगार पर है और अपना जीवन खत्म कर लेने पर उतारू है लेकिन किस्मत उसे एक मौका देती है जहां उसे एक मुश्किल चयन करना पड़ता है कि वह एक मसीहा बन जाये या एक साधारण इंसान और वो साधारण इंसान ही बनना मंजूर करता है। 'अपराधबोध' एक ऐसे युवा की कहानी है जो सोशल मीडिया के भ्रामक प्रचार-प्रसार से भ्रमित, दिशाहीन हो कर अपने भविष्य से खिलवाड़ करता एक हत्यारा बन जाता है लेकिन उसका अपराधबोध उसे कहीं भी चैन नहीं लेने देता।
‘एक नई भोर’ इस संकलन की तीसरी कहानी है जो मौत की दहलीज तक पहुंच चुकी युवती के अंदर एक रोशनी की तरह पैदा होती है और वह मरने से इनकार कर देती है। लोग उसे शर्मिंदा करना चाहते थे, हराना चाहते थे मगर वह चट्टान की तरह खड़ी हो जाती है अपने साथ हुए हर अन्याय का जवाब देने के लिये।
'वह कौन थी' एक ऐसी लड़की की बेचैन आत्मा की कहानी है, जिसकी मौत तक अंधेरे में दफन कर दी गई थी और अगर वह ख़ुद न कोशिश करती तो यह कभी न सामने आ पाता कि उसके साथ क्या हुआ था। बदकिरदार' चरित्र से जुड़ी आकांक्षाओं और वर्जनाओं को ढोती हर उस औरत की दास्तान है जो अपने हिस्से का शायद एक पल भी अपनी इच्छा से नहीं जी पाती और यह चरित्र आधारित दमन उसे विद्रोह पर उकसा कर अंततः अपने मन की कर लेने पर मजबूर कर देता है।
‘सुर्खाब’ मुस्लिम मआशरे में मौजूद लैंगिक भेदभाव को दर्शाती एक ऐसी कहानी है जहां एक लड़की अपने हक और बराबरी के मौके पाने के लिये लगातार जूझते हुए अपना घर तक छोड़ने पर मजबूर हो जाती है। 'अधूरी आजादी' इसी दौर के उस संघर्ष की कहानी है जहां पश्चिम की अंधाधुंध नकल के चक्कर में सामने दिखती पश्चिमी आजादी और अपने सेक्स प्रतिबंधित भारतीय समाज की वर्जनाओं के द्वंद्व में फंसी युवा पीढ़ी अपनी यौन कुंठाओं को तृप्त करने के पीछे छोटी-छोटी बच्चियों के शिकार से भी गुरेज नहीं कर रही।
'दो बूँद पानी' लगातार कम होते पानी के पीछे होने वाले उस संघर्ष की कहानी है जहां एक वक्त ऐसा भी आता है कि पानी की एक बूंद भी बेशकीमती हो जाती है और हम सभी को अंत पंत यह नर्क भोगना ही है। 'गर्म गोश्त का शौकीन' पैसे और पॉवर के गुरूर में सर से पांव तक डूबे उस शख्स की कहानी है जिसके लिये हर जनाना बदन बस एक 'योनि' ही है, इससे इतर कुछ नहीं।
'जंगल का आदमी' हर उस मूल मानव की दास्तान है जो अपनी जमीन और जंगल को बचाने के लिये विकास के नाम पर खड़े हुए पूंजीवादी सिस्टम से टकरा रहा है। 'पगली' जाति और धर्म आधारित जड़ आस्थाओं के खिलाफ जाती एक ऐसी प्रेम कथा है जहां रूढ़ियों से जकड़ी मशीनें इंसानी रिश्तों की अहमियत समझने की जगह उसे खत्म कर देने पर उतारू हैं।
जामुन की छाँव' उस दौर की कथा है जहां बेशुमार बढ़ती आबादी की जरूरतों के मद्देनजर हरियाली की बलि लेते-लेते हम अपने इको सिस्टम को ही वेंटिलेटर पर पहुंचा देते हैं। 'आकर्षण' कलर बायसनेस को ले कर रची एक कथा है जिसमें एक सांवली लड़की इस सामाजिक पूर्वाग्रह को खुद पर झेलते इस तरह बड़ी होती है कि अपनी ख्वाहिशें दर्शाने के लिये भी उसे दूसरों से ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। 'खामोश बगावत' संविधान प्रदत्त उस सुविधा का एक ऐसा पहलू है, जिसकी तरफ बहुत कम लोग देखते हैं कि कैसे ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ लड़ी जाने वाली लड़ाई खुद उसी विकार से संक्रमित हो रही है।
'इद्दत एक व्यथा' इस्लामिक मान्यताओं में से एक मान्यता के उस स्याह पहलू को दर्शाती है जहां एक औरत के लिये इम्तिहान ही इम्तिहान हैं तो मर्दों के लिये इसी मरहले पर एक रत्ती आजमाईश नहीं। यह अप्रासंगिक हो चुके रिवाजों को संशोधित करने के लिये की जाने वाली लड़ाई है जो औरत को अकेले लड़नी पड़ती है।
Giddhbhoj
Ashfaq Ahmad
Published on February 28, 2026 05:48
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Lafztarash
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