उदासी नींद, बावरा स्वप्न
सिसकियाँ ख़ामोशी हिचकी और ज़रा ठंडी हवा
रात जिस ढलान पर चली थी, सरकती गयी. हलकी स्याही में एक वही पुराना स्वप्न. जो पहले भी कई बार देखी हुई जगहों से होकर गुज़रता है.
घर के आँगन के बीच दक्खिन में एक पानी जमा करने का भूमिगत हौद बना हुआ है. इसकी जगत ज़मीन से तीन एक फीट ऊँची है. इस हौद की छत एकदम पारदर्शी. पानी भी इसमें ऐसा कि दस फीट नीचे तल में पड़ी हुई सुई को देखा जा सके.
प्यास लग आई.
हम दो लोग थे वहां पर. मैंने पानी खींचने के लिए टाँके यानी हौद के अन्दर देखा. वहां एक धारीदार लम्बा घोड़ा पड़ा हुआ था. वह टाँके के तल पर लेटा हुआ सा जान पड़ता था. मगर मैंने समझ लिया कि घोडा पानी के अंदर है तो मर चुका है. मन में एक चिंता आई कि पानी दो दिन बाद सड़ जाएगा. अब उस घोड़े को बाहर निकालने के लिए एक लम्बे बांस के सहारे रस्सी का फंदा बनना था. उस फंदे को घोड़े की किसी टांग में डालकर बांस निकालकर फिर रस्सी के सहारे घोड़े को उपर खींच लेना था.
घोड़े को निकालने के लिए कुछ सामान चाहिए थे.
एक दूकान है. जो कि ज़मीन से चार पांच फीट ऊँची है. उसके आगे सीढियां है और एक तीन फीट का रास्ता है. वहां से फुटबाल की पेलेंटी लेने की तैयारी हो रही थी. एक लड़का फिर लड़की और फिर एक लड़का. वे तीनों एक ही पंक्ति में उसी तीन फीट के रास्ते को रोक कर लाइन में खड़े थे. लड़की किसी बेले नर्तकी की तरह दो बार गोल घूमकर किक लेने के रास्ते से हट जाती है. लड़के भी एक तरफ हो जाते हैं. और फिर वहां कोई फुटबाल और कोई पेनल्टी स्ट्रोक लगाने वाला नहीं होता.
वहां पर तीन गोरे होते हैं. वे डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहे होते हैं. उनमें से एक हँसता है. मैं उसे कहता हूँ कि तुम क्या कहना चाहते हो. वह कुछ जवाब देता है मगर मैं उसे सुने बिना कहता हूँ- इसके दो ही परिणाम हो सकते थे. पहला कोई ऐसा इशारा था जो किसी जीत के लिए किया जाता हो अथवा शालीन हो. उस इशारे के बार में मुझे कुछ याद नहीं रहता मगर दूसरा इशारा था मिडल फिंगर को अश्लील तरीके से दिखाना. इस पर मेरे पास यानि पीछे खड़े किसी प्रिय ने कहा- ऐसा न करो.
वह भाई ही था. या मंझला या छोटे वाला. हमारे पास एक सायकिल थी. किसी बहुत बड़े मानव निर्मित पुल की ढलान की ओर चढ़ते हुए भाई ने कहा- हमें शायद उस रास्ते जाना चाहिए था. लेकिन नहीं जब हम उपर पहुंचे तो देखा कि ढलान पर पानी जमा हुआ है और वह काई से भर गया है. ज़रा देर बाद भाई ने कहा हम निकल सकते हैं. पानी के किनारे सूखे थे और कहीं कहीं बेहद कम पानी था.
वहां खरगोश थे. वे घास में कूद रहे थे. उनको किसी का डर नहीं था. वे खरगोश होकर बिल्लियों की तरह सीधे ऊपर की और छलांग लगा रहे थे. मैंने चाहा कि एक खरगोश को उठालूं. लेकिन खरगोश के बिल्लियों जैसे नाखून थे. मुझे लगा कि वे अजनबी हाथों को खरोंच सकते हैं.
एक घासफूस के छज्जे वाले घर के भीतर बक्सों के ऊपर एक खरगोश बैठा था. ये उन चार खरगोशों में से एक था, जो बड़े पुल के पास घास में खेल रहे थे. मैंने चाहा कि इस धूसर काले रंग वाले खरगोश की जगह काश वह सुनहरा खरगोश आ जाता.
स्वप्न फिर से घर में ले आया तो वहां पापा मिले. उन्होंने बताया कि पानी का भूमिगत हौद खाली हो चुका है. मैंने पूछा कि ये कैसे किया? अंदर देखा तो वहां सोया हुआ या मरा हुआ घोड़ा नहीं था. कुछ और इतने छोटे जानवर थे जैसे वे बच्चे हों. टाँके के तल को एक तरफ से छेद दिया गया था और पानी पूरा बह चुका था. पापा ख़ामोश रहते हैं. मगर वे ज़रूरी बात कहते हैं. वे जरूरी बात पूछते हैं. मैं उनको जवाब देता हूँ.
अचानक एक औरत मुझे पीठ की तरफ से पकड़ लेती है. उसकी बाहें मेरे सीने पर आगे की तरफ कस जाती हैं. मैं कहता हूँ- ये क्या? वो कहती है- हाँ ये ही. एक हल्की उत्तेजना होने लगती है.
स्वप्न रेगिस्तान की सुबह की ठंडी हवा की कंपकपी के कारण टूटता है. वह उत्तेजना असल में ठंड थी.
* * *
मैं जाग गया हूँ. मैं खोया हुआ हूँ. मैं घर से बाहर निकल जाना चाहता हूँ. कहीं सड़क पर चलता जाऊं. बाहर किसी से कोई काम नहीं है. बस कहीं जाकर बैठना चाहता हूँ. ऐसी जगह जहाँ खुला खुला हो सबकुछ.
रात जिस ढलान पर चली थी, सरकती गयी. हलकी स्याही में एक वही पुराना स्वप्न. जो पहले भी कई बार देखी हुई जगहों से होकर गुज़रता है.
घर के आँगन के बीच दक्खिन में एक पानी जमा करने का भूमिगत हौद बना हुआ है. इसकी जगत ज़मीन से तीन एक फीट ऊँची है. इस हौद की छत एकदम पारदर्शी. पानी भी इसमें ऐसा कि दस फीट नीचे तल में पड़ी हुई सुई को देखा जा सके.
प्यास लग आई.
हम दो लोग थे वहां पर. मैंने पानी खींचने के लिए टाँके यानी हौद के अन्दर देखा. वहां एक धारीदार लम्बा घोड़ा पड़ा हुआ था. वह टाँके के तल पर लेटा हुआ सा जान पड़ता था. मगर मैंने समझ लिया कि घोडा पानी के अंदर है तो मर चुका है. मन में एक चिंता आई कि पानी दो दिन बाद सड़ जाएगा. अब उस घोड़े को बाहर निकालने के लिए एक लम्बे बांस के सहारे रस्सी का फंदा बनना था. उस फंदे को घोड़े की किसी टांग में डालकर बांस निकालकर फिर रस्सी के सहारे घोड़े को उपर खींच लेना था.
घोड़े को निकालने के लिए कुछ सामान चाहिए थे.
एक दूकान है. जो कि ज़मीन से चार पांच फीट ऊँची है. उसके आगे सीढियां है और एक तीन फीट का रास्ता है. वहां से फुटबाल की पेलेंटी लेने की तैयारी हो रही थी. एक लड़का फिर लड़की और फिर एक लड़का. वे तीनों एक ही पंक्ति में उसी तीन फीट के रास्ते को रोक कर लाइन में खड़े थे. लड़की किसी बेले नर्तकी की तरह दो बार गोल घूमकर किक लेने के रास्ते से हट जाती है. लड़के भी एक तरफ हो जाते हैं. और फिर वहां कोई फुटबाल और कोई पेनल्टी स्ट्रोक लगाने वाला नहीं होता.
वहां पर तीन गोरे होते हैं. वे डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहे होते हैं. उनमें से एक हँसता है. मैं उसे कहता हूँ कि तुम क्या कहना चाहते हो. वह कुछ जवाब देता है मगर मैं उसे सुने बिना कहता हूँ- इसके दो ही परिणाम हो सकते थे. पहला कोई ऐसा इशारा था जो किसी जीत के लिए किया जाता हो अथवा शालीन हो. उस इशारे के बार में मुझे कुछ याद नहीं रहता मगर दूसरा इशारा था मिडल फिंगर को अश्लील तरीके से दिखाना. इस पर मेरे पास यानि पीछे खड़े किसी प्रिय ने कहा- ऐसा न करो.
वह भाई ही था. या मंझला या छोटे वाला. हमारे पास एक सायकिल थी. किसी बहुत बड़े मानव निर्मित पुल की ढलान की ओर चढ़ते हुए भाई ने कहा- हमें शायद उस रास्ते जाना चाहिए था. लेकिन नहीं जब हम उपर पहुंचे तो देखा कि ढलान पर पानी जमा हुआ है और वह काई से भर गया है. ज़रा देर बाद भाई ने कहा हम निकल सकते हैं. पानी के किनारे सूखे थे और कहीं कहीं बेहद कम पानी था.
वहां खरगोश थे. वे घास में कूद रहे थे. उनको किसी का डर नहीं था. वे खरगोश होकर बिल्लियों की तरह सीधे ऊपर की और छलांग लगा रहे थे. मैंने चाहा कि एक खरगोश को उठालूं. लेकिन खरगोश के बिल्लियों जैसे नाखून थे. मुझे लगा कि वे अजनबी हाथों को खरोंच सकते हैं.एक घासफूस के छज्जे वाले घर के भीतर बक्सों के ऊपर एक खरगोश बैठा था. ये उन चार खरगोशों में से एक था, जो बड़े पुल के पास घास में खेल रहे थे. मैंने चाहा कि इस धूसर काले रंग वाले खरगोश की जगह काश वह सुनहरा खरगोश आ जाता.
स्वप्न फिर से घर में ले आया तो वहां पापा मिले. उन्होंने बताया कि पानी का भूमिगत हौद खाली हो चुका है. मैंने पूछा कि ये कैसे किया? अंदर देखा तो वहां सोया हुआ या मरा हुआ घोड़ा नहीं था. कुछ और इतने छोटे जानवर थे जैसे वे बच्चे हों. टाँके के तल को एक तरफ से छेद दिया गया था और पानी पूरा बह चुका था. पापा ख़ामोश रहते हैं. मगर वे ज़रूरी बात कहते हैं. वे जरूरी बात पूछते हैं. मैं उनको जवाब देता हूँ.
अचानक एक औरत मुझे पीठ की तरफ से पकड़ लेती है. उसकी बाहें मेरे सीने पर आगे की तरफ कस जाती हैं. मैं कहता हूँ- ये क्या? वो कहती है- हाँ ये ही. एक हल्की उत्तेजना होने लगती है.
स्वप्न रेगिस्तान की सुबह की ठंडी हवा की कंपकपी के कारण टूटता है. वह उत्तेजना असल में ठंड थी.
* * *
मैं जाग गया हूँ. मैं खोया हुआ हूँ. मैं घर से बाहर निकल जाना चाहता हूँ. कहीं सड़क पर चलता जाऊं. बाहर किसी से कोई काम नहीं है. बस कहीं जाकर बैठना चाहता हूँ. ऐसी जगह जहाँ खुला खुला हो सबकुछ.
Published on October 20, 2015 20:02
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