एक तेरे आने की, याद के सिवा


तल्ख़ दिन अचानक बरसों पीछे छूट गए. 
खिड़की और दरवाज़ों के पल्ले वेगवती हवाओं से अपने आप उढक गए. एक बार सब कुछ कांपा और फिर शांत हो गया. बरसों से कोई अँधेरा गर्द की चादर के नीचे पड़ा हुआ था. कसक से भरे विकल मन की कोई ठांव न थी. अव्वल तो ज़िन्दगी कहने लायक तकलीफें देती ही नहीं है. फिर भी कोई ऐसी तकलीफ़ जिसे मनमीत से बाँट सकें तो भी उम्र की छीजत इस सुख को भी छीन लेती है. 
अब कहाँ बचा है कोई मीत. 
दूर तक एक उजाड़ उदासी है. आबाद चीज़ें बेपर्दा हो गईं है. कोई सुख एक स्मृति है और अधिकतर स्मृतियाँ सुख नहीं हैं. अधिकतर माने जिस तरफ टटोलिये उखड़े हुए पैबंद हैं. ज़िन्दगी जो हादसों की शक्ल में सीख देती है वे सीखें बहुत कुछ छीन लेती है. यकीन, आसरा, उम्मीद, दिलचस्पियाँ... सब पर धब्बे पड़ जाते हैं. ऐसे तेजाबी धब्बे जिनसे सिर्फ दाग नहीं छेद बनते हैं. 
एक कंधे पर लटकने वाला थैला तब तक साथ रखने का मन है जब तक दुनियादार हूँ. इस पर लिखा है आखिरी उम्मीद. जैसे कि आखिरी में आप फिर से एक जुआरी की तरह हारते जाएँ. इससे ज़िन्दगी ज़रा आसान लगती है. आसान कुछ नहीं होता बस भुलावा है और भुलावा बड़ी चीज़ है.


सब्र के प्याले को खाली न होने देना. 
जब खुद से ऐसा कहता हूँ तो दुनिया के कारोबार में लगे जगमग और अँधेरे चेहरों के पार एक तार का बाजा सुनाई पड़ता है. जा रहा है, जा रहा है, जा रहा है वक़्त. हर जगह बीत रहा है, रौशनी में और अँधेरे में भी. फिर किस चाह में, किस उम्मीद के खातिर और किस बिना पर? 
वेगवती हवाएं जब दीवारों से टकराकर जा चुकी थी, तब उसने कहा- ऐसी आभा देखी है कभी? इतना पीला उजास ओढा कभी? इतनी मोहक छवि धरती की सोची थी कभी? 
सोचा तो ये भी न था कि फिर एक चुप लग जाती है मगर मौसम मन के भीतर से उगता है. तल्खी की रुखसती. 
धूप, हवाओं का शोर, बारिश और शाम सब कुछ बुझ चुके हैं. बालकनी के दरवाज़े के पार दूर सड़क पर गोल घेरे में दिखती हुई रोशनियों के नीचे कुछ सरपट रोशनियाँ हैं. वे सम्मोहन की तरह हैं. वे एक के बाद एक अनियत और अद्वितीय हैं. 
कभी ठहरो तो गिरते हुए लम्हों को देखना, ठहरना बुरा न लगेगा. 
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Published on October 28, 2015 20:20
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Kishore Chaudhary
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