उस रुत झड़ गये थे पत्ते, इस बार?
[image error]
अलमारी की ऊपरी दराज़ में यूएसबी केबल्स रखीं हैं। अंगुलियां उनमें उलझकर सब्र भूल जाती हैं। सब्र जो पहले से ही चुकता जा रहा था। एक पतली पन्नी चाहिए। जिसमें कुछ साल्ट रखे हों। किसी कोने में अँधेरे और ठण्डी दीवार के सिवा कुछ हाथ नहीं लगता।
रात ठहर गयी है। आधे रास्ते में कोई और काली दीवार आ खड़ी हुई। रात को दीवार के पार कोई रास्ता नहीं है। रोशनियाँ नाकाम टूट-टूट कर वहीँ गिर पड़ती हैं जहाँ से उगी थीं। हर रौशनी रेंगने से लाचार तलछट को पीलेपन से रंगकर खो जाती है।
अचानक साँस की लड़ी टूटती है। एक अल्पविराम। अगली साँस के लिए कुएं से रहट खींचते हुए निर्जन उजाड़ चुप टोह लेता है। एक लहर सी पंजों से सर तक दौड़ती है। ज़हर की तड़प से भरी आंत के मरोड़ जैसी।
धप धप धप... सीढ़ियों पर थके अबकाये कदम कभी तेज़ कभी दीवानावार पहले तल से दूसरे तल और कभी छत पर। अलमारियों, दराजों और किताबों के आलों में पीछे छूटी जगहों पर हाथ घूमकर टटोलते हुए पन्नियों की तलाश खत्म नहीं होती। एक ऐसी गोली, ऐसा रसायन, ऐसा जैसे जान बख़्श दिए जाने की आस जगे। मगर नहीं मिलता।
मौसमों की बड़ी बातें लिखीं। उनकी बेवफ़ाई और मेहरों पर तकरीरें की मगर भूल गए कि मन का बन्धन अंततः धोखा ही साबित होगा। अब तक कोई ऐसा न मिला था तो कैसे इस रुत को समझ लिया कि अब उजाड़ और वीराना सिर्फ किताबों और यादों में बचा रह जायेगा।
सुबह के चार बजे डॉक्टर नहीं आया होगा। उस चारागर को किसी से मोहोब्बत हो जाये तो बेवक़्त क्लीनिक खोलकर इंतज़ार करने लगे। मगर नौ बजे सफ़ेद रंग की कार से उतर कर दरवाज़े की और बढ़ते हुए आँखों से दुआ सलाम हो जाती है।
एक छः सात साल का लड़का है। कमीज के बटन खोल कर बेंच पर बराबर बैठा है। उसके पेट से एक गाँठ निकाल दी है मगर चीरे की जगह टाँके नहीं लगाए हैं। वह चीरा पट्टी उतर जाने से ऐसा दीखता है जिसे रात इसी रास्ते से आई होगी। उसे देखते हुए अंगुलियां मुड़ने लगती है। मन को लगता है कहीं कोई अंगुली पकड़ कर उस चीरे से छुआ न दे।
उस रुत पत्ते झड़ गए थे मगर कोई कोंपल बची रह गयी थी। इस बार?
साँस फिर उखड़ती है। कदम बदन का बोझा उठाये बाहर आते हैं। क्या कहूँगा? डॉक्टर! कोई ऐसी दवा है आपके पास जिससे आंसू आते हों?
रात ठहर गयी है। आधे रास्ते में कोई और काली दीवार आ खड़ी हुई। रात को दीवार के पार कोई रास्ता नहीं है। रोशनियाँ नाकाम टूट-टूट कर वहीँ गिर पड़ती हैं जहाँ से उगी थीं। हर रौशनी रेंगने से लाचार तलछट को पीलेपन से रंगकर खो जाती है।
अचानक साँस की लड़ी टूटती है। एक अल्पविराम। अगली साँस के लिए कुएं से रहट खींचते हुए निर्जन उजाड़ चुप टोह लेता है। एक लहर सी पंजों से सर तक दौड़ती है। ज़हर की तड़प से भरी आंत के मरोड़ जैसी।
धप धप धप... सीढ़ियों पर थके अबकाये कदम कभी तेज़ कभी दीवानावार पहले तल से दूसरे तल और कभी छत पर। अलमारियों, दराजों और किताबों के आलों में पीछे छूटी जगहों पर हाथ घूमकर टटोलते हुए पन्नियों की तलाश खत्म नहीं होती। एक ऐसी गोली, ऐसा रसायन, ऐसा जैसे जान बख़्श दिए जाने की आस जगे। मगर नहीं मिलता।
मौसमों की बड़ी बातें लिखीं। उनकी बेवफ़ाई और मेहरों पर तकरीरें की मगर भूल गए कि मन का बन्धन अंततः धोखा ही साबित होगा। अब तक कोई ऐसा न मिला था तो कैसे इस रुत को समझ लिया कि अब उजाड़ और वीराना सिर्फ किताबों और यादों में बचा रह जायेगा।
सुबह के चार बजे डॉक्टर नहीं आया होगा। उस चारागर को किसी से मोहोब्बत हो जाये तो बेवक़्त क्लीनिक खोलकर इंतज़ार करने लगे। मगर नौ बजे सफ़ेद रंग की कार से उतर कर दरवाज़े की और बढ़ते हुए आँखों से दुआ सलाम हो जाती है।
एक छः सात साल का लड़का है। कमीज के बटन खोल कर बेंच पर बराबर बैठा है। उसके पेट से एक गाँठ निकाल दी है मगर चीरे की जगह टाँके नहीं लगाए हैं। वह चीरा पट्टी उतर जाने से ऐसा दीखता है जिसे रात इसी रास्ते से आई होगी। उसे देखते हुए अंगुलियां मुड़ने लगती है। मन को लगता है कहीं कोई अंगुली पकड़ कर उस चीरे से छुआ न दे।
उस रुत पत्ते झड़ गए थे मगर कोई कोंपल बची रह गयी थी। इस बार?
साँस फिर उखड़ती है। कदम बदन का बोझा उठाये बाहर आते हैं। क्या कहूँगा? डॉक्टर! कोई ऐसी दवा है आपके पास जिससे आंसू आते हों?
Published on October 18, 2015 12:30
No comments have been added yet.
Kishore Chaudhary's Blog
- Kishore Chaudhary's profile
- 16 followers
Kishore Chaudhary isn't a Goodreads Author
(yet),
but they
do have a blog,
so here are some recent posts imported from
their feed.

