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कुश कल्याण, बूढ़ा केदार, ऋषियों की साधना स्थली-तपोवन, बालीपास (17500 फीट), कालिन्दी खाल पास (19890 फीट), दरवा टॉप (14500 फीट), गणेश की जन्मस्थली-डोडी ताल, शंकर एवं काली माँ की मिलन स्थली-रूपकुंड, दुर्योधन के छुपने के गुप्त स्थल-हर की दून,
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“भैरोघाटी, जहाँ तिब्बत से आने वाली जाठ गंगा का भागीरथी से मिलन होता है, पर बड़ा पुल बनने के बाद से अब तो सड़क ऐन गंगोत्तरी तक पहुँच गई है।”
― Darra Darra Himalaya
― Darra Darra Himalaya
“लेकिन इतना मालूम है कि इन सबके बीच एक चीज़ तेज़ी से उभर रही थी— शान्ति। एक गहरी शान्ति। अजीब, अपूर्व तथा अनिर्वचनीय आनन्द की अनुभूति आँखों के कोरों को नम कर रही थी, कंठ को रूँध रही थी। आज के आनन्द की अनुभूति, उस ‘आनन्द’ की अनुभूति से जुदा थी जो मुझे मिलती थी शहर में भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति पर, या बौद्धिक विवेचनाओं में जीतने पर या उच्च पदों पर आसीन होने पर या लोगों द्वारा प्रशंसा किए जाने पर। वह आनन्द हमें पछाड़ें खिलाता था—चिखवाता था, यह आनन्द हमें रुला रहा था। अगर वह आनन्द था तो आज का एहसास क्या था और यदि आज का आनन्द ही ‘आनन्द’ था तो फिर उस शहरी आनन्द का क्या महत्त्व— क्या ज़रूरत, क्या उपयोग?”
― Darra Darra Himalaya
― Darra Darra Himalaya
“कतई नहीं”...,अपर्णा स्थिर एवं गम्भीर स्वर में बोल रही थी— “मन से यह ख़याल निकाल दो कि हमें यहाँ जबरन लाया गया है। हमारी सामाजिक व्यवस्था ने, तुम पुरुषों के जेहन में यह सामन्तवादी धारणा गहरे तक पैठा दी है कि स्त्री और बच्चे पुरुष के मातहत हैं। मेरा इस समय यहाँ होना तुमसे हमारे जुड़ाव का द्योतक है, न कि बंधन का लक्षण। हम विवश नहीं— स्वतंत्र हैं। हम अधीन हैं किन्तु— स्वाधीन। मैं तथा अद्वैत, हम दोनों यहाँ हैं क्योंकि हम यहाँ आना चाहते थे।” अपनी वाणी को विराम देते हुए अपर्णा मेरे निकट सरक आई थी। “आप लोगों का हो गया हो तो अब थोड़ा सो लें। मौसम ठीक रहा तो रनी भैया कुछ ही देर में उठाने आ जाएँगे”... अद्वैत ने करवट बदल मेरी ओर देखते हुए कहा। टेंट में रोशनी न होने के बावजूद उसके अश्रु मुझसे छुप न सके। घुमड़ते नयनों में बिजलियाँ जो कौंधती हैं!”
― Darra Darra Himalaya
― Darra Darra Himalaya
“सोनी किसी भी हाल हमें न तो दोपहर में सोने देता और न ही हमें हमारे कान ढकने देता था। कान का ढकना तो चलते समय भी निषिद्ध था— सोनी के अनुसार ऐसा करने से ऊँचाई के लिए आवश्यक अनुकूलन ठीक प्रकार से नहीं होता है। कान तभी ढँकना जब हवाएँ तेज़ हों या सूरज ढल गया हो या जब हम स्लीपिंग बैग से बाहर निकले हों।”
― Darra Darra Himalaya
― Darra Darra Himalaya
“अरे आप जीवन की दौड़ से भागकर यहाँ हिमालय पर आए हैं— कुछ देर ठहरकर देखें तो सही। गुज़रते क्षण और आते क्षण के मध्य में जो एक छुपा हुआ स्पन्दनहीन अन्तराल है, आती और जाती साँस के मध्य जो एक निष्कम्प ठहराव है, उसको महसूस करने की चेष्टा करें। गति से अभिभूत हम लोग उस ठहराव की आदतन उपेक्षा करते हैं, जबकि मुझे लगता है कि जिस आनन्द की खोज में हम सब भाग रहे हैं वह तो उसी ठहराव में छुपा हमारा इन्तज़ार कर रहा होता है।”
― Darra Darra Himalaya
― Darra Darra Himalaya
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