Rutvij

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by Umesh Pant (Goodreads Author)
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Book cover for Darra Darra Himalaya (Hindi Edition)
कुश कल्याण, बूढ़ा केदार, ऋषियों की साधना स्थली-तपोवन, बालीपास (17500 फीट), कालिन्दी खाल पास (19890 फीट), दरवा टॉप (14500 फीट), गणेश की जन्मस्थली-डोडी ताल, शंकर एवं काली माँ की मिलन स्थली-रूपकुंड, दुर्योधन के छुपने के गुप्त स्थल-हर की दून, ...more
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“हर आदमी में होते हैं दस बीस अदमी जिसको भी देखना हो कई बार देखन।”
अजय सोडानी, Darra Darra Himalaya

“दार्शनिक पॉल फ्रेडरिक सीमन के शब्दों में: ‘‘मनुष्य वही सुनता है जो वह सुनना चाहता है, बाकी बातों को वह अनसुना कर देता है।”
Biswaroop Roy Chowdhury, हार्ट माफिया : Heart Mafia

“मुफ़लिसी आदमी को इतना दीन बना देती है कि अगर उसके घर में घुसकर भी उसका अपमान करें तो भी वह आपको आँख उठाकर देखेगा नहीं। वह कुछ बोलेगा नहीं क्योंकि उसकी ज़ुबान छिपकली की तरह उसके तालू से चिपक जाएगी। वह चुपचाप पाँव के नाखून से ज़मीन कुरेदने लगेगा— धरती को फाड़ कर धँस जाने की मंशा से। “सर,”
अजय सोडानी, Darra Darra Himalaya

“गंगा को नदी न कहकर महानदी या नदियों का हाइवे कहना ज़्यादा उचित होगा। भागीरथी, मंदाकिनी, अलकनन्दा, भीलंगना, धोली गंगा एवं पिंडार नदियाँ बड़ी शिद्दत के साथ आपस”
अजय सोडानी, Darra Darra Himalaya

“रुको तुम- मत खोलो इन बन्द पटों को, मुझे बहुत डर लगता है – इन पटों के पीछे बंद हैं कितनी दबी अवाज़ें, विह्वल चीत्कार, कितनी सुनी आँखें, कातर पुकार, कित्ने हाथों का कम्पन, रुँधी गुहार, कितनी आशाएँ, बेबस मनुहार– ये सब धीरे-धीरे पटों के पीछे बन्द हो गइ हैं उन सब अनगिनत अतिरेकों के संग, जो जमाई हैं हमने हमारे भविष्य को देने को रंग- इन पटों से दुर रहो, तुम मत खोलो इन्हें, मुझे बहुत दर लगता है- पत खुलते ही वो आँखें, पुकार, गुहार, वह आशाएँ काँपते हाथों में बन्द में अभिलाषाएँ, छिटक कर तिजोरी से फैल जाएँगी पूरे शयनकक्ष में, करेंगी पीछा मेरा खरोंचने को अपना वर्तमान, मेरे भविष्य से– तुम तब तक दूर रहो अलमारी के पेटों से, जब तक कि मैं शिकार न कर लूँ मुँडेरों से झाँकती सारी भावनाओं का, रुको तुम मत खोलो इन पटों को - मुझे बहुत डर लगता है”
अजय सोडानी, Darra Darra Himalaya

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