Rutvij

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by Umesh Pant (Goodreads Author)
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Book cover for Darra Darra Himalaya (Hindi Edition)
कुश कल्याण, बूढ़ा केदार, ऋषियों की साधना स्थली-तपोवन, बालीपास (17500 फीट), कालिन्दी खाल पास (19890 फीट), दरवा टॉप (14500 फीट), गणेश की जन्मस्थली-डोडी ताल, शंकर एवं काली माँ की मिलन स्थली-रूपकुंड, दुर्योधन के छुपने के गुप्त स्थल-हर की दून, ...more
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“कुश कल्याण, बूढ़ा केदार, ऋषियों की साधना स्थली-तपोवन, बालीपास (17500 फीट), कालिन्दी खाल पास (19890 फीट), दरवा टॉप (14500 फीट), गणेश की जन्मस्थली-डोडी ताल, शंकर एवं काली माँ की मिलन स्थली-रूपकुंड, दुर्योधन के छुपने के गुप्त स्थल-हर की दून, महादेव की नृत्य स्थली-रुदुगैरा, पांडवों द्वारा पदाक्रान्त-आडेन कॉल (17800 फीट) एवं धुमदार कांडी (18000 फीट) तथा लद्दाख़ हिमालय के दर्रों में— अब तक भटक रहे हैं। इस यायावरी के दौरान अपना स्वरूप बदलते गंगोत्तरी, खतलिंग, रुदुगैरा, कालानाग आदि अनेक ग्लेशियर मेरे कैमरे में छुप महफूज़ हो गए, तथा इसी दौरान अपनी दुकानदारी”
अजय सोडानी, Darra Darra Himalaya

“मामूली सी छड़ी के सहारे जब मैं अधर में लटका था तब वह कौन था जो मुझे थामे खड़ा था— मैं नहीं जानता— शायद ईश्वर और ईश्वरीय शक्तियाँ ऐसे ही अपने-आपको प्रकट करती होंगी...”
अजय सोडानी, Darra Darra Himalaya

“भैरोघाटी, जहाँ तिब्बत से आने वाली जाठ गंगा का भागीरथी से मिलन होता है, पर बड़ा पुल बनने के बाद से अब तो सड़क ऐन गंगोत्तरी तक पहुँच गई है।”
अजय सोडानी, Darra Darra Himalaya

“कतई नहीं”...,अपर्णा स्थिर एवं गम्भीर स्वर में बोल रही थी— “मन से यह ख़याल निकाल दो कि हमें यहाँ जबरन लाया गया है। हमारी सामाजिक व्यवस्था ने, तुम पुरुषों के जेहन में यह सामन्तवादी धारणा गहरे तक पैठा दी है कि स्त्री और बच्चे पुरुष के मातहत हैं। मेरा इस समय यहाँ होना तुमसे हमारे जुड़ाव का द्योतक है, न कि बंधन का लक्षण। हम विवश नहीं— स्वतंत्र हैं। हम अधीन हैं किन्तु— स्वाधीन। मैं तथा अद्वैत, हम दोनों यहाँ हैं क्योंकि हम यहाँ आना चाहते थे।” अपनी वाणी को विराम देते हुए अपर्णा मेरे निकट सरक आई थी। “आप लोगों का हो गया हो तो अब थोड़ा सो लें। मौसम ठीक रहा तो रनी भैया कुछ ही देर में उठाने आ जाएँगे”... अद्वैत ने करवट बदल मेरी ओर देखते हुए कहा। टेंट में रोशनी न होने के बावजूद उसके अश्रु मुझसे छुप न सके। घुमड़ते नयनों में बिजलियाँ जो कौंधती हैं!”
अजय सोडानी, Darra Darra Himalaya

“मुफ़लिसी आदमी को इतना दीन बना देती है कि अगर उसके घर में घुसकर भी उसका अपमान करें तो भी वह आपको आँख उठाकर देखेगा नहीं। वह कुछ बोलेगा नहीं क्योंकि उसकी ज़ुबान छिपकली की तरह उसके तालू से चिपक जाएगी। वह चुपचाप पाँव के नाखून से ज़मीन कुरेदने लगेगा— धरती को फाड़ कर धँस जाने की मंशा से। “सर,”
अजय सोडानी, Darra Darra Himalaya

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