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Surender Mohan Pathak Surender Mohan Pathak > Quotes

 

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“धोखा देना और धोखा खाना इंसानी फितरत है, जो इस लानत से आजाद है वो जरूर जंगल में रहता है।”
Surender Mohan Pathak, धोखा
“कोटि प्रयास करे किन कोय
कि सत्य का दीप बुझे न बुझाये”
Surender Mohan Pathak, वहशी
“ भाई जान से जायेगा, तू भाई से जायेगा | "
- Gawaahi”
Surender Mohan Pathak, गवाही
“तलवार का घाव भर सकता है लेकिन जुबान की खराश जिन्दगी का नासूर बन जाती है.”
Surender Mohan Pathak, गोल्डन गर्ल
“सच का गला झूठ उतना नहीं घोंटता जितना कि खामोशी घोंटती है।”
Surender Mohan Pathak, डबल गेम
“आनंद को ख़ुशी से कंफ्यूज नहीं किया जाना चाहिए| ख़ुशी आनंद से एकदम जुड़ा अहसास है| ख़ुशी में आनंद का सामावेश हमेशा होता है, लेकीन ऐसा आनंद आम पाया जाता है जिसमे कोई ख़ुशी नहीं होती”
Surender Mohan Pathak, खतरे की घंटी
“क्रोध में वो आंधी होती है जो विवेक का दीपक बुझा देती है”
Surender Mohan Pathak, गोल्डन गर्ल
“कोई काम नामुमकिन नहीं होता। मुश्किल होता है, ज्यादा मुश्किल होता है लेकिन नामुमकिन नहीं होता।”
Surender Mohan Pathak, डबल गेम
“गुनाह को आंखों के सामने होता देख कर खामोश रहना गुनहगार की मदद करना है।”
Surender Mohan Pathak, डबल गेम
“जीवित रहना एक महान कर्तव्य है| जीवन जैसा भी हो उसे सहन करना चाहिए”
Surender Mohan Pathak
“सफलतायें दोस्त बनाती है, विफलतायें उन्हें आजमाती है।”
Surender Mohan Pathak, कोलाबा कांस्पीरेसी
“हर सज्जन पुरूष ईश्वर का एजेंट होता है जिसे वो अपनी पावर्स डैलीगेट करता है, सद्कार्य के लिये निमित्त बनाता है ताकि वो - परमपिता परमात्मा - जो चाहता है, वो हो सके।”
Surender Mohan Pathak, चेम्बूर का दाता
“पुस्तक प्रेमी बनिये, पुस्तकों को अपनाइये,पढने की आदत डालिये ताकि आपके पढ़ा-लिखा होने की सार्थकता स्थापित हो|याद रखिए पुस्तक से सच्चा साथी कोई नहीं|पुस्तकों का संसार असीम है| पुस्तकें ज्ञान का वह समुद्र है जिसकी एक बूंद भी आपके हिस्से में आई तो समझिये आपने बहुत कुछ पाया है| ज्यादा की तो बात ही क्या है”
Surender Mohan Pathak
tags: books
“आस्था प्रमाणों पर आधारित विश्वास नहीं, बल्कि अबाध समर्पण का नाम ही आस्था है!”
Surender Mohan Pathak, बीवी का हत्यारा
“मानव जीवन परहित अभिलाषी ही होना चाहिये।”
Surender Mohan Pathak, डबल गेम
“जिंदगी को एक सिग्रेट की तरह एंजाय करो, वरना सुलग तो रही ही है, एक दिन वैसे ही खत्म हो जानी है।”
Surender Mohan Pathak, चोरों की बारात
“लाख जौहर हों आदमी में, आदमियत नहीं तो कुछ भी नहीं।”
Surender Mohan Pathak, कोलाबा कांस्पीरेसी
“कोई अनुष्ठान, कोई यज्ञ, कोई जप-तप प्रारब्ध को नहीं बदल सकता। फेट इज इनएवीटेबल। नियति अटल है।”
Surender Mohan Pathak, पूरे चाँद की रात
“कुत्ते और आदमी में बुनियादी फर्क ये है कि तुम किसी भूखे कुत्ते के लिये दयाभाव दिखाओ और उसे रोटी खिला कर मरने से बचाओ तो वो तुम्हें कभी नहीं काटता।”
Surender Mohan Pathak, पूरे चाँद की रात
“जब दांत थे तो दाने नहीं थे, आज दाने है तो दांत नहीं है!”
Surender Mohan Pathak, शक की सुई
“बनाने वाले ने मेरी तकदीर ही ऐसी उकेरी है कि हमेशा मुझे खुद अपने आप से सवाल करना पड़ता है कि इस शहर में मुझसे बुरा भी क्या कोई होगा! कौन होगा कोई जिस के प्रारब्ध के पन्ने पर काली स्याही फिरी होगी! साहेब,”
Surender Mohan Pathak, मुझसे बुरा कोई नहीं
“कोई दुश्वारी आन खड़ी होती है तो समझ आसमानी बाप इम्तहान लेता है. कोई प्रॉब्लम फॉरएवर नहीं होता.”
Surender Mohan Pathak, कोलाबा कांस्पीरेसी
“मस्जिद में दिया जलाने से पहले घर में दिया जलाने की फिक्र करनी चाहिये।”
Surender Mohan Pathak, डबल गेम
“गलती किसी से भी हो सकती है। गलती करना नादानी है। गलती करके उसको सुधारने की कोशिश ना करना ज्यादा बड़ी नादानी है।”
Surender Mohan Pathak, सीक्रेट एजेंट
“काबिलियत दिखाने का मौका ना मिले तो काबिलियत किसी काम की नहीं।”
Surender Mohan Pathak, दो गज कफन
“नहीं”
Surender Mohan Pathak, क्रिस्टल लॉज
“चरित्र”
सुरेन्द्र मोहन पाठक, Safal Apradhi
“आइकानिक लेखक जिक्र के काबिल होते हैं, पढ़ने के काबिल नहीं होते इसलिए ट्रेड से बाहर हो जाते हैं।”
सुरेन्द्र मोहन पाठक, हम नहीं चंगे…बुरा न कोय- आत्मकथा ‘लेखकीय जीवन के सबसे हलचल वाले दिनों की कथा
“बात याद रखो । जिसको मोह माया ज्यादा सताती है, वो ज्यादा संतप्त होता है । जितनी बड़ी आशा को कोई आसरा देता है, उतनी ही बड़ी निराशा पल्ले पड़ने की सम्भावना होती है । जो जितना ऊंचा उड़ता है उतनी ही ऊंचाई से गिरने का उसे खतरा होता है । इसलिये इच्छाओं पर, आशा तृष्णाओं पर अंकुश रखना चाहिये, उन्हें आपे से बाहर नहीं होने देना चाहिये”
सुरेन्द्र मोहन पाठक, Sher Savaari (Vimal Book 34)
“इससे ज्यादा गर्म ड्रिंक्स के शौकीन हो” - वह शरारतभरे स्वर में बोली - “तो तुम्हें शेखावत साहब के आने तक इन्तजार करना पड़ेगा ।” “जी नहीं ।” - मैं बोला - “इस वक्त यही ठीक है । मुझे इतनी ज्यादा गर्म चीजों का शौक नहीं कि मुंह ही जल जाये और” - मैं एक क्षण ठिठका और बोला - “कलेजा भी ।” वह हंसी । मैंने कॉफी का कप उठाया और बड़े अर्थपूर्ण ढंग से उसे देखता हुआ बोला -”
सुरेन्द्र मोहन पाठक, Maut Ka Farmaan (Vimal Book 7)

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