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“किसी माँ को धर्मात्मा पुत्र हो चाहे न हो, पराक्रमी हो चाहे न हो, धनुर्धर और गुणी हो चाहे न हो; पर उसके पुत्र को भाग्यवान् अवश्य होना चाहिए।’’ मैंने अनुभव किया कि कुंती बुआ के जीवन का यही कठोर सत्य है। बड़े-से-बड़े पुरुषार्थ को प्रारब्ध चुटकी”
― संघर्ष
― संघर्ष
“राजा अपने अहं का दास होता है और ऋषि अपने अहं का स्वामी। स्वामी को दास नहीं नचा सकता, पर दास को स्वामी तो नचा ही सकता है।”
― दुरभिसंधि
― दुरभिसंधि
“आकर्षण में एक प्रकार का खिंचाव अवश्य होता है, पर भोग की इच्छा नहीं होती, जितनी आसक्ति में।”
― दुरभिसंधि
― दुरभिसंधि
“मेरे मन पर अदृश्य जगत् से दृश्य जगत् का अधिक प्रभाव है।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“मृत्यु तो अंतिम विकल्प है, वह कभी संकल्प नहीं होता—और जीवन संकल्प के साथ जीया जाता है। भागने से समस्या हल नहीं होती वरन् वह और भयंकरता के साथ पीछा करती है।”
― लाक्षागृह
― लाक्षागृह
“बात यद्यपि कितनी पुरानी हो चुकी है। तब से यमुना का कितना पानी बह गया होगा। संसार कितना बदल गया; पर मैं अपनी मानसिकता बदल नहीं पाया, अपनी यह दुर्बलता छोड़ नहीं पाया। प्रकृति के परिवेश बदलते ही मैं एक ऐसे संसार में चला जाता हूँ जहाँ न दुःख है, न व्यग्रता है, न चिंता है, न राजनीति है और न यहाँ की झंझटें। वहाँ केवल राधा है और मैं हूँ। प्रकृति की सरसता है और है सरसता की प्रकृति।”
― लाक्षागृह
― लाक्षागृह
“वस्तुतः भगवान् कुछ और नहीं है, वह दुर्बल मन का आलंबन है। डूबते को तिनके का सहारा है। अभाव और व्यग्रता में एक भरोसा है।”
― नारद की भविष्यवाणी
― नारद की भविष्यवाणी
“प्रेम एक ऐसी अग्नि है, जिसमें डूबनेवाला व्यक्ति न जल्दी जलता है और न जल्दी मरता है, केवल”
― खांडव दाह
― खांडव दाह
“बाँस बाँसुरी की अस्मिता नहीं है, वह तो केवल आधार है।...आधार के न रहने पर भी अस्मिता रहेगी। शरीर के न रहने पर भी आत्मा तो रहती ही है।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“अतीत को भुलाना अपने इतिहास को भुलाना है।’’ मैंने कहा, ‘‘और इतिहास को भुलाकर कोई व्यक्ति या संस्कृति अपनी पहचान भूल जाती है। अतएव इतिहास को भूलना नहीं चाहिए और इतिहास में जीना भी नहीं चाहिए।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“आप चमत्कार को भी चमत्कृत कर देनेवाले चमत्कारी हैं।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“भक्ति में एकपक्षीय समर्पण है और विवाह में द्विपक्षीय। भक्ति में भगवान् की स्वीकृति है और विवाह में समाज की।”
― संघर्ष
― संघर्ष
“मनुष्य के पास मृत्यु की अनिश्चितता और स्वप्न न होता तो जीवन दूभर हो जाता। मृत्यु की ओर हम हर क्षण बढ़ते जा रहे हैं और हर क्षण मानते हैं कि मृत्यु अभी हमसे दूर है। यही विश्वास हमारी सभी योजनाओं की नींव है। यही विश्वास हमारे उन स्वप्नों का आधार है, जो स्वयं हमारे गंतव्य बन जाते हैं और हम उनकी ओर दौड़ने लगते हैं।”
― नारद की भविष्यवाणी
― नारद की भविष्यवाणी
“फिर विस्थापित को तो स्थापित किया जा सकता है, पर हमारे सामने स्थापित को स्थापित करने का प्रश्न था।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“दो पुष्पों की निकटता में द्वैत का आभास होता है, पर गंधोंमें वह अद्वैत हो जाता है। हम अलग-अलग भले ही दीखते थे, पर हमारी गंध एक थी।”
― नारद की भविष्यवाणी
― नारद की भविष्यवाणी
“राधा की भक्ति तो संयोग प्रेम की घनीभूत छाया है। मेरी भक्ति तो वियोग प्रेम की। एक में मिलन का संतोष है तो दूसरे में वियोग की छटपटाहट। राधा ने कभी आपको खोया नहीं था, मैंने कभी आपको पाया ही नहीं था। राधा का आपके प्रति आकर्षण दर्शन के कारण था। मेरे आकर्षण में अदर्शन है, सहज विश्वास है, श्रवणमात्र पर आधृत पूर्वानुराग है। एक में बाह्य इंद्रियों का लगाव था और दूसरे में आंतरिक। अब आप ही सोचिए, किसकी भक्ति में घनत्व अधिक है?”
― दुरभिसंधि
― दुरभिसंधि
“षड्यंत्र और चुनौती का कोई संबंध नहीं, राधा। षड्यंत्र के मूल में विनाश की भावना होती है और चुनौती के मूल में पौरुष की परीक्षा की।”
― नारद की भविष्यवाणी
― नारद की भविष्यवाणी
“दुष्कर्मों का फल प्रभु देता है या नहीं, यह तो मैं नहीं जानता; पर दुष्कर्म अपने जन्म के समय से ही अपने कर्मी को प्रताड़ित करना आरंभ कर देते हैं—कभी पश्चात्ताप की अग्नि में जलाकर, कभी भविष्य के प्रति आतंकित करके।”
― खांडव दाह
― खांडव दाह
“जिसमें स्वयं परिस्थितियों को पढ़ने की योग्यता हो, उसे आदेश देना निरर्थक भी है।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“राजनीतिज्ञ के लिए सत्य और झूठ एक सिक्के के दो पहलू मात्र होते हैं। उपयोगिता के आधार पर ही वह उन्हें परखता है। सत्य में उसकी कोई आसक्ति नहीं, झूठ से उसकी कोई विरक्ति नहीं।...जैसा अवसर देखा और जिससे लाभ की संभावना बनी,”
― नारद की भविष्यवाणी
― नारद की भविष्यवाणी
“स्वयं युद्ध के पास कभी नहीं गया; पर जब युद्ध मेरे पास आया, मैंने उसे गले लगाया। संघर्ष को जीने में मेरी रुचि थी, झेलने में नहीं। झेलने के मूल में वितृष्णा होती है, जीने में रस। इसीसे संघर्ष में मुझे एक प्रकार के आनंद की अनुभूति होती थी।”
― नारद की भविष्यवाणी
― नारद की भविष्यवाणी
“शांति किसीसे मिलती नहीं, राजन्, वह तो स्वयं अपने भीतर रहती है। केवल उसको देखने की दृष्टि मिलती है।’’ आचार्यजी बड़ी गंभीरता से मुसकराए—‘‘यदि वह दृष्टि खुल जाए तो न कहीं अशांति है और न कहीं शांति!”
― नारद की भविष्यवाणी
― नारद की भविष्यवाणी
“खोई हुई वस्तु का खोज पाना कभी-कभी कठिन होता है; पर छोड़ी हुई वस्तु अपनी जान में रहती है—और कभी-कभी अपने पास ही।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“बाँह में रुक्मिणी के रहते हुए भी आह में राधा ही रहती है। रुक्मिणी मेरे जीवन के साथ है और राधा मेरी आत्मा के साथ। जीवन समाप्त हो जाने के बाद रुक्मिणी का संबंध समाप्त हो जाएगा; पर राधा का संबंध जन्म-जन्मांतर तक चलता रहेगा।”
― लाक्षागृह
― लाक्षागृह
“बुरे कर्मों का फल नागदंश के विष की तरह तुरंत चढ़ता है और अच्छे कर्मों का फल प्रतीक्षा के पात्र में बंद मैरेय की तरह सीझता रहता”
― नारद की भविष्यवाणी
― नारद की भविष्यवाणी




