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“सिद्धान्त सोने का गहना है ! रोज-रोज पहनने की चीज नहीं ! शादी-ब्याह तीज-त्योहार में पहन लिया बस ! सिद्धान्त की बात साल में एक-आध बार कर ली, कर ली; बाकी अपनी पालिटिक्स करो ।” उम्मीद”
― kashi ka assi
― kashi ka assi
“उनका एक जीवन-दर्शन था–‘जो पठितव्यम् तो मरितव्यम्, न पठितव्यम् तो मरितव्यम्, फिर दाँत कटाकट क्यों करितव्यम् ?”
― Kashi Ka Assi
― Kashi Ka Assi
“जो मज़ा बनारस में, न पेरिस न फ़ारस में।
'गुरु' यहाँ की नागरिकता का सरनेम है। न सिंह, न पांडे, न जादो, न राम! सब गुरु ! जो पैदा भया, वह भी गुरु, जो मरा, वो भी गुरु!”
― काशी का अस्सी
'गुरु' यहाँ की नागरिकता का सरनेम है। न सिंह, न पांडे, न जादो, न राम! सब गुरु ! जो पैदा भया, वह भी गुरु, जो मरा, वो भी गुरु!”
― काशी का अस्सी
“ऐ दुनियावालों! वह पलना लकड़ी है जिसपे बचपन में सोए थे! वह गुल्ली डंडा लकड़ी है, जिससे खेले थे! वह पटरी भी लकड़ी है जिसे लेकर स्कूल गए थे! वह छड़ी भी लकड़ी है जिससे मुदर्रिस की मार खाई थी! ब्याह का पीढ़ा भी लकड़ी है जिसपर ब्याह रचाया था! सुहाग की सेज भी लकड़ी है जिसपर दुल्हन के साथ सोये थे! बुढ़ापे का सहारा लाठी भी तो लकड़ी ही है!
ऐ दुनियावालों! अंतकाल जिस टिकटी पर मसान जाते हो, और जिस चिता पर तुम्हें लिटाया जाता है-सब लकड़ी है!
यह संसार कुछ नहीं, सिर्फ लकड़ी का तमाशा है!”
― काशी का अस्सी
ऐ दुनियावालों! अंतकाल जिस टिकटी पर मसान जाते हो, और जिस चिता पर तुम्हें लिटाया जाता है-सब लकड़ी है!
यह संसार कुछ नहीं, सिर्फ लकड़ी का तमाशा है!”
― काशी का अस्सी
“बड़े-बुजुर्ग’ का मतलब घर का ऐसा सदस्य जिसकी सलाह या आदेश को बकवास समझा जाए, जिस पर ध्यान देने की जरूरत न समझी जाए ! जैसे अगर वह चिल्लाए कि ‘अरे देखो ! बैला खूँटा तुड़ा के भागा जा रहा है, पकड़ो उसे’ या ‘गैया को नाँद से हटाकर नीम की छाँह में बाँध दो’ तो लड़के-बच्चे ताश खेल रहे हों तो खेलते रहें ! यानी, वह जो अपने जीते-जी फालतू हो जाए !”
― Kashi Ka Assi
― Kashi Ka Assi
“लेकिन देश जहाँ-का-तहाँ नहीं था । मुहल्लेवालों को दाल खाए दो महीने हो गए थे । गेहूँ और कोयला-दोनों एक भाव बिक रहे थे । यानी ढाई रुपए किलो, चाहे कोयला खाइए, चाहे गेहूँ !”
― Kashi Ka Assi
― Kashi Ka Assi
“तुम इनमें फड़फड़ा सकती हो, उड़ नहीं सकतीं । जिन दीवारों में तुम घिरी हो, उन्हें सिर्फ हथौड़े ही तोड़ सकते हैं । और यह तो सिर्फ सेंध है ।”
― Mahuacharit
― Mahuacharit
“मन्दिर की घंटियों और चपुओं और पानी के हिलकोरों की आवाजें और मछलियों की उछाल की चमक”
― kashi ka assi
― kashi ka assi
“हम हर चीज के बँटवारे सह लेते हैं लेकिन देह का बँटवारा नहीं सहा जाता । ऐसा क्यों है ? ऐसा क्या है देह में कि उसका तो कुछ नहीं बिगड़ता लेकिन मन का सारा रिश्ता–नाता तहस–नहस हो जाता है ।”
― Mahuacharit
― Mahuacharit
“प्यार एक खोज है सल्लो । जीवन-भर की खोज । कभी खतम, । कभी खतम, कभी शुरू । खोज किसी और की नहीं, खुद की! हम स्वयं को दूसरे मैं ढूँढ़ते हैं, एक बिछड़ जाता है या छूट जाता है तो लगता है जिन्दगी खत्म । जीने का कोई अर्थ नहीं रह जाता! आँखों के आगे शून्य और अँधेरा! हर चीज बेमानी हो जाती है । लेकिन कुछ समय बाद कोई दूसरा मिल जाता है और नए सिर से अँखुआ फूट निकलता है! फिर लहलह, फिर महमह! यह दूसरी बात है कि दूसरा भी स्वयं को ढूंढ़ते हुए टकराता है! सच कहो तो प्यार की खूबसूरती हर बार उसके अधूरेपन मैं ही है! उसकी यानी प्यार की उम्र जितनी ही छोटी हो उतनी ही चमक और कौंध! अगर लम्बी हुई तो सड़ाँध आने लगती है!”
― Rehan Par Ragghu
― Rehan Par Ragghu
“जिन्दगी गुजरी थी चौराहे पर, फुटपाथ पर, घाट पर, ‘बहरी अलंग’ में । काम चलाया एक गमछा और लैंगोट में । बालू और माटी से अच्छा कौन सा साबुन है, वही पोता और घंटों साफा पानी दिया । रुपए-पैसे हाथ की मैल थे, करतार का दिया हुआ ‘चना चबेना गंगजल’ छत्तीसों प्रकार के व्यंजन । ‘कछु लेना न देना, मगन रहना’ उनकी जीवन बूटी था । मस्ती उनकी जिन्दगी थी और हँसी साँस । बड़े-से-बड़ा ओहदा, बड़ी-से-बड़ी कोठी, बड़ा-से-बड़ा लाट गवन्नर पसम बराबर”
― kashi ka assi
― kashi ka assi
“मुझे भी एक ‘कोई’ की सख्त जरूरत महसूस होने लगी थी जो इस बदलाव को झुठला दे और साबित कर दे कि मैं औरत हूँ और किसी भी पुरुष को मर्द बनाने की क्षमता रखती हूँ ।”
― Mahuacharit
― Mahuacharit
“शरीफ’ इंसान का मतलब है निरर्थक आदमी; भले आदमी का मतलब है ‘कायर’ आदमी । जब कोई आपको ‘विद्वान’ कहे तो उसका अर्थ ‘मूर्ख समझिए, और जब कोई ‘सम्मानित’ कहे तो ‘दयनीय’ समझिए”
― Rehan Par Ragghu
― Rehan Par Ragghu
“अगर आप उन्हें काम नहीं दे सकते, रोजगार नहीं दे सकते, अगर वे किसी से कुछ माँगते नहीं, छीनते नहीं, तीन-तेरह नहीं करते, अगर वे किसी का कुछ बिगाड़ते नहीं और जिस हाल में हैं उसी हाल में अपनी हँसी हँसते हैं तो आपको तो निश्चिन्त और खुश होना चाहिए”
― kashi ka assi
― kashi ka assi
“आई गवनवाँ की सारी उमर अबहीं मोरी बारी, साज समाज पिया लै आए, अउर कहंरवा चारी ।”
― kashi ka assi
― kashi ka assi
“पति–पत्नी नमक–पानी नहीं है– कि इस तरह घुल–मिल जायँ कि न पानी पानी रहे, न नमक नमक उन दोनों की अपनी–अपनी प्राइवेसी होनी चाहिए और अपनी अपनी जिन्दगी ।”
― Mahuacharit
― Mahuacharit
“सच पूछिए तो चिन्ता जीने का सबसे बड़ा सबब है । जब तक चिन्ता है तब तक जिन्दगी । चिन्ता खतम, जिन्दगी खतम”
― Mahuacharit
― Mahuacharit
“ठीक से समझ में आ जाने के बाद कोई अपने को छिपाना भी चाहे तो पूरी तरह नहीं छिपा सकता । वह आपके सामने हो या न हो, कहाँ क्या कर रहा होगा, क्या सोच रहा होगा–उसके बिना बताए हमें आभास हो जाता है ।”
― Mahuacharit
― Mahuacharit
“दिल और दलदल एक जैसे होते हैं । दलदल में पाँव फँस जाय तो बाहर आना मुश्किल, दिल में कोई बात धँस जाय तो निकलनी मुश्किल”
― Mahuacharit
― Mahuacharit
“दस साल में वसुधा भूमंडल हो जाती है और प्यार कूड़ेदान का कचरा । उसकी जगह डस्टबिन हो जाती है, दिल नहीं ।”
― Mahuacharit
― Mahuacharit
“मेरी आँखों से चिमटी में फँसी हुई मांस की वह गुलाबी गोली हट ही नहीं रही थी जिसे ‘फीटस’ कहते हुए डाक्टर ने गर्भ के प्रमाण के रूप में मुझे दिखाया था । मैं जब भी उस पर नजर गड़ाती, वह मुझे घूरती हुई एक ही प्रश्न करती–बार–बार : अगर मैं तुम दोनों के चरम सुख का वरदान थी तो इसमें मेरी क्या गलती थी ?”
― Mahuacharit
― Mahuacharit
“यह मानी हुई बात है कि कोई लड़की चाहे जितनी सुन्दर हो, अपने सौन्दर्य को लेकर हमेशा सन्देह में रहती है कि वह जरूरत से ज्यादा लम्बी और दुबली है, छातियाँ छोटी हैं, कि कमर मोटी है, कि जाँघें भरी–भरी नहीं हैं, कि बाहें सूखी लकड़ी जैसी हैं! वह चाहती है कि कोई हो जो सिर्फ इतना भर कह दे कि नहीं, तुम्हारी जैसी खूबसूरत लड़की मैंने नहीं देखी ।”
― Mahuacharit
― Mahuacharit
“कवन देस का राजा अच्छा, कवन देस की रानी ? अरे कवन देस का राजा अच्छा, कवन देस की रानी ? कवन देस का कपड़ा अच्छा, कवन देस का पानी ? जोगीड़ा सारा रा, जोगीड़ा सा रा रा रा... कानपूर का कपड़ा अच्छा राजघाट का पानी । अरे, रामनगर का राजा अच्छा इटलीगढ़ की रानी : जोगीड़ा सारा रा रा...”
― kashi ka assi
― kashi ka assi
“बभना बेदरदी दरदियो न जाने जोड़त गाँठ हमारी । उमर अबहीं पोरी बारी... टूटल गाँव नगर से नाता, छूटल महल अँटारी । विधि गति वाम कछु समुझि परे ना बैरन भइ महतारी । उमर अबहीं मोरी... नदिया किनारे बलस मोर रसिया, दी घूंघट पट डारी । (टिप्पणी : अय हय हय हय ! बलम मोर रसिया, क्या बात है !) चार जरा मिलि डोली उठावें, घरवा से देत निकारी उमर अबहीं मरी बारी... कहत कबीर सुनो भई साधो, छमियो चूक हमारी, अबकी गवना बहुरि नहिं अवना मिलिलेहु भेंट अँकवारी ।”
― kashi ka assi
― kashi ka assi




