एक प्रेम अलभ्य था

सैंकड़ों दोस्त और हज़ारों फॉलोवर में ख़ुशी की एक बूँद नहीं मिली। संख्या बढती जाती, संदेशे बढ़ते जाते, वाह-वाही बढती जाती. इस बढ़त में भी अनमना अरुचि का सागर मिला। कम ओ बेश हर कोई वही दे रहा था जो उसे स्वयं के लिए चाहिए था. जिस तरह मैं तुम्हें सराहूँ उसी तरह तुम भी आओ चंदन के शीतल लेप लेकर. बस एक प्रेम अलभ्य था. कहाँ मन था ऐसा कि किसी इसी तरह कि दुनिया बाशिंदे होते. बस जो मिला उसमें पाया कि आत्ममुग्धता के आवरण में बन्दी व्यक्तियों के संसार में रचनात्मकता एक प्रदर्शन मात्र थी। चेतना का आंकलन अनुपयोगी कचरे के ढेर से था। विमर्श और चिंतन की उपलब्धि गुणात्मक न होकर संख्या पर आंकी जा रही थी। 
प्रेम पीठ खुजाने जैसी वृतियों से परिभाषित था। 
इसलिए उचटा हुआ मन इस संसार के प्रति अनिच्छा की पुनरावृति में निबद्ध था। दम्भ अथवा चापलूसी की क्रिया अनुभूतियों से घिरे व्यक्तियों के प्रति समर्थन भरे प्रदर्शनकारी क्रियाकलापों में आबद्ध होना आतंरिक प्रवृति के विरुद्ध था। इसे जड़ता कहा जाये तो भी ये अपनी पसन्द प्रदर्शित करने के सस्तेपन से श्रेष्ठ अवस्था समझ आई। 
तुमसे लगावट जब प्रेम की सीमारेखा को स्पर्श कर भीतर की ओर प्रवेश करती है, तब पाया कि मेरे प्रिय का इतना कथित सहज और सरल होना अशोभनीय और निम्न होना भर रह जाता है। हम सहज सरल होते हैं, ये मानव का श्रेष्ठ गुण है. मैं स्वयं भी ऐसा होना चाहता हूँ मगर ऐसा होने के पश्चात् पाता कि इससे सुख की जगह पश्चाताप आता है. मेरे अपने अनुभव इस तरह के हैं कि सहज-सरल आचरण से किसी भी विध प्रसन्न होने के स्थान पर अथवा इसके प्रति उदासीन रहने से अलग व्यथा ही आती है.  

प्रिये जब मैं एक क्षणांश में उसका त्याग करता हूँ जो तुम्हे प्रिय नहीं है, इसको क्रूर होना समझना गलत आंकलन है। वास्तव में मेरी समझ ने जो मुझे सीख दी है, वह केवल इतनी भर है कि प्रेम के असीम होने में भी अपने प्रिय की नापसन्द का सम्मान करना मेरी आवश्यकता में सबसे ऊपर है। सुखों और चाहनाओं के भार से श्रेष्ठ है इकलौते अथवा अल्प के संग जीना। मेरे लिए तुम हो तो अतिरिक्त जो कुछ है, वह अनचाहा है। सांसारिक गतिविधि वास्तव में भीतर की क्रिया होनी चाहिए और अनेक द्वारा रचित सम्पादित कार्यों से सांसारिक स्वरूप का बनना, होना चाहिए। 
हम सोच और स्वभाव के स्तर पर भिन्न हैं। चेतनापूर्ण रचनात्मकता के संग प्रवाहित होने में तुमसे जुड़े अथवा तुम जिसने जिनसे जुड़े हो के बारे में सोचना वास्तव में बाधा भर है। 
प्रेम मगर प्रेम है। कभी-कभी वैसी ही क्रियाओं में लपेट लेता है जिनसे अनुराग नहीं है। ____________________
[Painting Image Courtesy;  Navin Tan]
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Published on November 01, 2015 23:52
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Kishore Chaudhary
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