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“हम जिनके लिए त्याग करते हैं उनसे किसी बदले की आशा न रखकर भी उनके मन पर शासन करना चाहते हैं, चाहे वह शासन उन्हीं के हित के लिए हो, यद्यपि उस हित को हम इतना अपना लेते हैं कि वह उनका न होकर हमारा हो जाता है। त्याग की मात्रा जितनी ही ज़्यादा होती है, यह शासन-भावना भी उतनी ही प्रबल होती है और जब सहसा हमें विद्रोह का सामना करना पड़ता है, तो हम क्षुब्ध हो उठते हैं, और वह त्याग जैसे प्रतिहिंसा का रूप ले लेता है।”
― गोदान [Godan]
― गोदान [Godan]
“तुच्छ है राज्य क्या है केशव?
पाता क्या नर कर प्राप्त विभव?
चिंता प्रभूत, अत्यल्प हास,
कुछ चाकचिक्य, कुछ क्षण विलास |
पर वह भी यहीं गँवाना है,
कुछ साथ नहीं ले जाना है |
'मुझसे मनुष्य जो होते हैं,
कंचन का भार न ढोते हैं,
पाते हैं धन बिखराने को,
लाते हैं रतन लुटाने को |
जग से न कभी कुछ लेते हैं,
दान ही हृदय का देते हैं |
'प्रासादों के कनकाभ शिखर,
होते कबूतरों के ही घर,
महलों में गरुड़ ना होता है,
कंचन पर कभी न सोता है |
बसता वह कहीं पहाड़ों में,
शैलों की फटी दरारों में |
'होकर समृद्धि-सुख के अधीन,
मानव होता नित तप: क्षीण,
सत्ता, किरीट, मणिमय आसन,
करते मनुष्य का तेज-हरण.
नर विभव हेतु लालचाता है,
पर वही मनुज को खाता है |
'चाँदनी, पुष्प-छाया में पल,
नर भले बने सुमधुर, कोमल,
पर अमृत क्लेश का पिये बिना,
आतप अंधड़ में जिये बिना,
वह पुरुष नहीं कहला सकता,
विघ्नों को नहीं हिला सकता |
'उड़ते जो झंझावतों में,
पीते जो वारि प्रपातों में,
सारा आकाश अयन जिनका,
विषधर भुजंग भोजन जिनका,
वे ही फणिबंध छुड़ाते हैं,
धरती का हृदय जुड़ाते हैं |
'मैं गरुड़ कृष्ण ! मैं पक्षिराज,
सिर पर ना चाहिए मुझे ताज |
दुर्योधन पर है विपद घोर,
सकता न किसी विधि उसे छोड़,
रण-खेत पाटना है मुझको,
अहिपाश काटना है मुझको”
― रश्मिरथी
पाता क्या नर कर प्राप्त विभव?
चिंता प्रभूत, अत्यल्प हास,
कुछ चाकचिक्य, कुछ क्षण विलास |
पर वह भी यहीं गँवाना है,
कुछ साथ नहीं ले जाना है |
'मुझसे मनुष्य जो होते हैं,
कंचन का भार न ढोते हैं,
पाते हैं धन बिखराने को,
लाते हैं रतन लुटाने को |
जग से न कभी कुछ लेते हैं,
दान ही हृदय का देते हैं |
'प्रासादों के कनकाभ शिखर,
होते कबूतरों के ही घर,
महलों में गरुड़ ना होता है,
कंचन पर कभी न सोता है |
बसता वह कहीं पहाड़ों में,
शैलों की फटी दरारों में |
'होकर समृद्धि-सुख के अधीन,
मानव होता नित तप: क्षीण,
सत्ता, किरीट, मणिमय आसन,
करते मनुष्य का तेज-हरण.
नर विभव हेतु लालचाता है,
पर वही मनुज को खाता है |
'चाँदनी, पुष्प-छाया में पल,
नर भले बने सुमधुर, कोमल,
पर अमृत क्लेश का पिये बिना,
आतप अंधड़ में जिये बिना,
वह पुरुष नहीं कहला सकता,
विघ्नों को नहीं हिला सकता |
'उड़ते जो झंझावतों में,
पीते जो वारि प्रपातों में,
सारा आकाश अयन जिनका,
विषधर भुजंग भोजन जिनका,
वे ही फणिबंध छुड़ाते हैं,
धरती का हृदय जुड़ाते हैं |
'मैं गरुड़ कृष्ण ! मैं पक्षिराज,
सिर पर ना चाहिए मुझे ताज |
दुर्योधन पर है विपद घोर,
सकता न किसी विधि उसे छोड़,
रण-खेत पाटना है मुझको,
अहिपाश काटना है मुझको”
― रश्मिरथी
“Science may provide the most useful way to organize empirical, reproducible data, but its power to do so is predicated on its inability to grasp the most central aspects of human life: hope, fear, love, hate, beauty, envy, honor, weakness, striving, suffering, virtue.”
― When Breath Becomes Air
― When Breath Becomes Air
“Don't ever underestimate the people who love you.”
― The Inexplicable Logic of My Life
― The Inexplicable Logic of My Life
“I was not going to feel sorry for myself. No, why should I? When my form came back, or when I picked up wickets, or when I got the big scores, or when I got player of the match, or hit six sixes, had I ever asked God, ‘why me?’ Of course not. Often in my career, I have been the man with silver in the fist. Have I ever asked God, ‘why me?’ No, never. So when the illness came I had no right to ask ‘why me?”
― The Test of My Life
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Sir Walter Scott Appreciation
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— last activity Aug 01, 2021 01:41PM
How many novels by Sir Walter Scott have you read? If you are a serious reader of classics of the 19th century and like good stories with history, rom ...more
Prince’s 2025 Year in Books
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