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“कल कोई मुझ को याद करे क्यूँ कोई मुझ को याद करे
मसरूफ़ ज़माना मेरे लिए क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे।”
― Kuliyat e Sahir / کلیات ساحر
मसरूफ़ ज़माना मेरे लिए क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे।”
― Kuliyat e Sahir / کلیات ساحر
“जीना मुश्किल है कि आसान ज़रा देख तो लो
लोग लगते हैं परेशान ज़रा देख तो लो
फिर मुक़र्रिर कोई सरगर्म सर-ए-मिंबर है
किस के है क़त्ल का सामान ज़रा देख तो लो
ये नया शहर तो है ख़ूब बसाया तुम ने
क्यूँ पुराना हुआ वीरान ज़रा देख तो लो
इन चराग़ों के तले ऐसे अँधेरे क्यूँ है
तुम भी रह जाओगे हैरान ज़रा देख तो लो
तुम ये कहते हो कि मैं ग़ैर हूँ फिर भी शायद
निकल आए कोई पहचान ज़रा देख तो लो
ये सताइश की तमन्ना ये सिले की परवाह
कहाँ लाए हैं ये अरमान ज़रा देख तो लो”
― लावा
लोग लगते हैं परेशान ज़रा देख तो लो
फिर मुक़र्रिर कोई सरगर्म सर-ए-मिंबर है
किस के है क़त्ल का सामान ज़रा देख तो लो
ये नया शहर तो है ख़ूब बसाया तुम ने
क्यूँ पुराना हुआ वीरान ज़रा देख तो लो
इन चराग़ों के तले ऐसे अँधेरे क्यूँ है
तुम भी रह जाओगे हैरान ज़रा देख तो लो
तुम ये कहते हो कि मैं ग़ैर हूँ फिर भी शायद
निकल आए कोई पहचान ज़रा देख तो लो
ये सताइश की तमन्ना ये सिले की परवाह
कहाँ लाए हैं ये अरमान ज़रा देख तो लो”
― लावा
“चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों।
न मैं तुम से कोई उम्मीद रखूँ दिल-नवाज़ी की।
न तुम मेरी तरफ़ देखो ग़लत-अंदाज़ नज़रों से।
न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाए मेरी बातों से।
न ज़ाहिर हो तुम्हारी कश्मकश का राज़ नज़रों से।
तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेश-क़दमी से।
मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जल्वे पराए हैं।
मिरे हमराह भी रुस्वाइयाँ हैं मेरे माज़ी की।
तुम्हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साए हैं।
तआ'रुफ़ रोग हो जाए तो उस का भूलना बेहतर।
तअ'ल्लुक़ बोझ बन जाए तो उस को तोड़ना अच्छा।
वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे इक ख़ूबसूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा।
चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों।”
―
न मैं तुम से कोई उम्मीद रखूँ दिल-नवाज़ी की।
न तुम मेरी तरफ़ देखो ग़लत-अंदाज़ नज़रों से।
न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाए मेरी बातों से।
न ज़ाहिर हो तुम्हारी कश्मकश का राज़ नज़रों से।
तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेश-क़दमी से।
मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जल्वे पराए हैं।
मिरे हमराह भी रुस्वाइयाँ हैं मेरे माज़ी की।
तुम्हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साए हैं।
तआ'रुफ़ रोग हो जाए तो उस का भूलना बेहतर।
तअ'ल्लुक़ बोझ बन जाए तो उस को तोड़ना अच्छा।
वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे इक ख़ूबसूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा।
चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों।”
―
“I really hated what I was before I met you. There was this chill, like 'I can't stay this way'. I think I worked so hard because I was driven to sadness by how much I wanted to skate. But ... when I reach Level 6, I don't need that chill any longer. It's like, when I pass that test... I need to say goodbye, and thanks... to the self that I hated.”
― メダリスト 4
― メダリスト 4
“मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
मैंने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए
यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म
रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग”
―
मैंने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए
यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म
रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग”
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